रविवार, 17 सितंबर 2023

चौठचन्द्र {चौरचन} पूजा विधि मन्त्र और कथा सहित

चौठचन्द्र (चौरचन) पूजा विधि मन्त्र और कथा सहित 

जय चौठचन्द्र भगवान🙏🏼🙏🏼
============= भादव शुक्ल चतुर्थी पहिल साँझ व्रती स्नान कऽ आसन पर बैसि पूजाक सब सामग्री अरिपन अनुसार दही डाली मररक खीर-पूरी दीप संग कलश स्थापन कय कुशक वा सोना चांदी पवित्री पहिर तिल कुशा जल लय इ मंत्र पढि सामग्री संग जल छिटी स्वयं पवित्र होई छथि- नमः अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सवाह्याभ्यन्तर: सुचि।। नमः पुण्डरीकाक्ष: पुनातु। नमः पुण्डरीकाक्ष: पुनातु। नमः पुण्डरीकाक्ष: पुनातु। कहि क अपना ऊपर और पूजन सामग्री पर जल स सिक्त करू।। 
गणपत्यादि पंचदेवता पूजन- अक्षत लय-नमो गणपत्यादि पंचदेवता: इहागच्छत इह तिष्ठत। कहि पात पर एककात राखि दी। 
 अर्घा में जल लय- एतानि पाद्यादीनि एषोर्घ: नमो गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। 
 फूल में चानन लगाक- इदमनुलेपनं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नमः ।
 अक्षत लय- इदमक्षतं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।
 फूल लय-इदं पूष्प गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। 
 बेलपात लय-इदं विल्वपत्रं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। 
 दूबि लय-इदं दुर्वादलम् गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। 
 जल लय- एतानि गंधपुष्पधूपदीप ताम्बुलयथाभाग नानाविध नैवेद्यानि गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। नैवेद्य पर  उत्सर्ग करी।
जल लय-इदमाचमनीयं नमो गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। 
 पुष्पाञ्जलि- एष पुष्पाञ्जलि गणपत्यादि पञ्चदेवता भ्यो नमः।
विधवा स्त्री तील लय- नमो भगवत् भगवान श्रीविष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ। पूजा के बगल में पात पर राखू। जल लय-एतानि पाद्यादीनि एषोर्घ: नमोभगवते श्रीविष्णवे नम:।पूजा पात पर चढा दी। अहिना फूल तुलसीपात आदि स पंचोपचार पूजा करी।
सुहागिन स्त्री गौरी पूजा करथि- अक्षत लय-नमो गौरि इहागच्छ इह तिष्ठ।
 जल लय-एतानि पाद्यादीनि नमो गौर्ये नम:। 
 चानन लय-इदमनुलेपनं नमो गौर्ये नम:। सिंदुर लय-इदं सिन्दूराभरणं नमो गौर्ये नम:।
 अक्षत लय-इदमक्षतं नमो गौर्ये नम:।
 फूल लय-इदं पुष्पं नमो गौर्ये नम:।
 दुबि लय- इदं दुर्वादलम नमो गौर्ये नम:।
 बेलपात लय- इदं विल्वपत्रं नमो गौर्ये नम:। 
 जल लय-एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बुल यथाभाग नानाविध नैवेद्यानि नमो गौर्ये नम:।नैवेद्य पर उत्सर्ग करी। 
 जल लय-इदमाचमनीयं नमो गौर्ये नम:।

 तिल कुशा जल लय संकल्प मंत्र- नमोऽस्यां रात्रौ भाद्रे मासि शुक्ल पक्षे चतुर्थ्यां तिथौ शुभवासरे (दिन क नाम लिय)अमुक गोत्राया:(अप्पन गोत्र लिय) ममाऽमुकीदेव्या:(अप्पन नाम लिय) ।।सकल कल्याणोत्पत्तिपूर्वक धनधान्यादि समृद्धि सकल मनोरथ सिद्धयर्थं यथाशक्ति गंधपुष्प धूपदीप ताम्बूल यज्ञोपवित वस्त्रनानाविध-नैवेद्यादिभि: रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्रपूजनं तत्कथा श्रवण संकल्प अहं करिष्ये।।
चौठचन्द्र पूजा- 
अक्षत लिय-नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्र इहागच्छ इह तिष्ठ।पात पर राखू।
 उजर फूल लिय- श्वेतांबरं स्वच्छतनुं सुधांशु चतुर्भुजं हेमविभूषणाढ्यम्। वरं सुधा दिव्यकमण्डलुञ्च करैरभीतिञ्च दधानभीडे।। एष पपुष्पाञ्जलि नमो रोहिनिसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चन्द्राय नमः। 
 जलक अर्घ्यदान-सोमाय सोमेश्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम:। एतानि पाद्यादीनि एषोऽर्घ्य: नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम:। 
 चानन लय-मलयाद्रिसमुद्भूतं श्रीखंडं त्रिदशाप्रियम्। सर्वपापहरं सौख्यं चंदनं मे प्रगृह्यताम्। इदमनुलेपनं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम:।
 अक्षत लय-इदमक्षतं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम:।
 उजर फूल लय - त्रैलोक्यमोदकं पुष्पं शुक्ल पुष्पं मनोहरम्।दिव्यौषधि क्षपानाथ गृह्यतां च प्रसीद मे। एतानि पुष्पाणि नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।
 बेलपात लय-इदं विल्वपत्रं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नमः। 
 दुर्वा लिय-इदं दुर्वादलम नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नमः।
 यज्ञोपवित लय- सुसंस्कृतं चतुर्वेदैर्द्विजानां भूषणं वरम्।यज्ञोपवितंदेवेश कृपया मे प्रगृह्यताम्। इमे यज्ञोपविते वृहस्पतिदैवते नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।
 वस्त्र लय- तन्तुसन्तानसम्भूतं कलाकोशलकल्पितम्। सर्वाङ्गभूषणश्रेष्ठं वसनं परिधीयताम्।।इदं वस्त्रं वृहस्पतिदैवतं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।
 नैवेद्य- नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्ति मे ह्यचलां कुरू। ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परांङ्गतिम।। एतानि गंधपुष्प धूपदीपसदधिपक्वान्नादि नानाविध नैवेद्यानि नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।
 पुंगीफल- पूंगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्। कर्पूरादिसमायुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्।।एतानि ताम्बूलानि नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।
 धूप- गन्धभारवहं दिव्यं नानावस्तुसमनवितम्। सुरासुरनरानन्दं धूपं देव गृहाण मे।। एष धूप: नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :। 
 कलशदीपदानम्- मार्तण्डमण्डलाखण्डचन्द्रबिम्बाग्निदीप्तिमान्। विधात्रा देवदीपोऽयं निर्मितस्तेऽस्तु भक्तित:।। एष कलशदीप: नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :। 
 शंख में फल फूल दूध लय-
अत्रिनेत्रसमुद्भूत क्षीरोदार्णवसंभव।
गृहामार्घ्य मया दत्तं रोहिण्या सहितप्रभो । इदं दुग्धार्घ्यं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :। 
डाली लय चंद्र दर्शन मंत्र- 
सिंह प्रसेन मवधीत्सिंहो जाम्बवताहत ।
 सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक ।।
प्रणाम मंत्र-
नम: शुभ्रांशवे तुभ्यं द्विजराजाय ते नम । 
रोहिणीपतये तुभ्यं लक्ष्मीभ्रात्रे नमोऽस्तु ते ।।
दही छाँछी लय प्रणाम मंत्र -
दिव्यशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसंभवम् ।
 नमामि शशिनं भक्त्या शंभोर्मुकुट भूषणम् ।।
प्रार्थना मंत्र -
 मृगाङ्क रोहिणीनाथ शम्भो : शिरसि भूषण । 
व्रतं संपूर्णतां यातु सौभाग्यं च प्रयच्छ मे ।। 

 रुपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवन् देहि मे। 
पुत्रान्देहि धनन्देहि सर्वान् कामान् प्रदेहि मे।। 
 फेर प्रणाम क हाथ म फूल ल क कथा सुनु जे ई प्रकार ऐछ

( चौरचन कथा )

 चौरचन के सम्बन्ध में स्कन्दपुराण मे चन्द्रोपाख्यान शीर्षक सँ वर्णित कथा - नन्दिकेश्‍वर सनत्कुमार सँ कहैत छथिन्ह- "हे सनत कुमार ! यदि अहाँ अपन शुभक कामना करैत छी तऽ एकाग्रचित सँ चन्द्रोपाख्यान सुनू । पुरुष होथि वा नारी ओ भाद्र शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र पूजा करथि । ताहि सँ हुनका मिथ्या कलंक तथा सब प्रकार केँ विघ्नक नाश हेतैन्ह।" सनत्कुमार पुछलिन्ह- "हे ऋषिवर ! ई व्रत कोना पृथ्वी पर आएल से कहु।" त नन्दकेश्‍वर बजलाह-"ई व्रत सर्व प्रथम जगत केर नाथ श्री कृष्ण पृथ्वी पर कैलथिन्ह। सन्तकुमार केँ आश्‍चर्य भेलैन्ह। षड्गुण ऐश्‍वर्य सं सम्पन्‍न सोलहो कला सँ पूर, सृष्टिक कर्त्ता-धर्त्ता, ओ केना लोकनिन्दाक पात्र भेलाह। नन्दीकेश्‍वर कहैत छथिन्ह – "हे सनत्कुमार! बलराम आओर कृष्ण, वसुदेव केर पुत्र भऽ पृथ्वी पर वास केलथिन्ह। ओ जरासन्धक भय सँ द्वारिका गेलथिन्ह। ओतय विश्‍वकर्मा द्वारा अपन पत्नीसबहक लेल १६ हजार तथा यादव सब केँ लेल ५६ करोड़ घर केँ निर्माण कय वास केलथिन्ह। ओहि द्वारिका मे उग्रनाम केर यादव केँ दूटा बेटा छलैन्ह, सतजित आओर प्रसेन। सतजित समुद्र तट पर जा अनन्य भक्‍तिसँ सूर्यक घोर तपस्या कय हुनका प्रसन्‍न केलाह। प्रसन्‍न सूर्य प्रगट भऽ वरदान माँगू कहलखिन। सतजित हुनका सँ स्यमन्तक मणिक याचना कयलन्हि। सूर्य मणि दैत कहलथिन्ह, "हे सतजित! एकरा पवित्रता पूर्वक धारण करब, अन्यथा अनिष्ट होएत।" सतजित ओ मणि लऽ नगर मे प्रवेश करैत विचारय लगलाह ई मणि देखि कृष्ण मांगि नहि लेथि। ओ ई मणि अपन भाइ प्रसेन केँ देलखिन। एकदिन प्रसेन श्री कृष्ण केर संग शिकार खेलय लेल जंगल गेलाह। जंगल मे प्रसेन पछुआ गेलाह। सिंह हुनका मारि मणि लऽ क चलल तऽ ओकरा जाम्बवान्‌ भालू मारि देलखिन । जाम्बवान्‌ ओ मणि लऽ अपना निवास स्थान मे प्रवेश कऽ खेलऽ लेल अपना पुत्र केऽ देलखिन । एम्हर कृष्ण अपना संगी साथीक संग द्वारिका ऐलैथ। ओहि समूहमे लोक सब प्रसेन केँ नहि देखि बाजय लगलाह जे ई पापी कृष्ण मणिक लोभ सँ प्रसेन केँ मारि देलाह। एहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण व्यथित भऽ चुप्पहि, प्रसेनक खोज लेल जंगल गेलाह। ओतऽ देखलाह प्रसेन मरल छथि। अाराे आगू गेलाह तऽ देखलाह एकटा सिंह मरल अछि। किछ देर अाराे आगू गेलाह त उत्तर दिशामे एकटा गुफा देखलाह। ओहि गुफा मे प्रवेश केलाह । ओ गुफा अन्धकारमय छलैक। ओकर दूरी १०० योजन यानि ४०० मील छल। कृष्ण अपना तेज सँ अन्धकार के नाश कय जखन अंतिम स्थान पर पहुँचलाह तऽ देखैत छथि कि खूब मजबूत, खूब निक सुन्दर भवन अछि। ओहि मे खूब सुन्दर पालना पर एकटा बच्चा के दाय झुला रहल छैक। बच्चा क आँखिक सामने ओ मणि लटकल छैक आ दाय गबैत छैक – "सिंहः प्रसेनं अवधीत्, सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदी तव हि एषः स्यमन्तकः॥" अर्थात्‌ "सिंह प्रसेन केँ मारलाह, सिंह जाम्बवान्‌ सँ मारल गेल, औ बौआ! जूनि कानू! अहींक ई स्यमन्तक मणि अछि।" तखनैहि एक अपूर्व सुन्दरी विधाताक अनुपम सृष्टि युवती ओतय अयलीह। ओ कृष्ण केँ देखि काम-ज्वर सँ व्याकुल भऽ गेलीह। ओ बजलीह, "हे कमलनेत्र! ई मणि अहाँ लियऽ आओर तुरत भागि जाउ। जा धरि हमर पिता जाम्बवान्‌ सुतल छथि।" श्री कृष्ण प्रसन्‍न भऽ शंख बजा देलथिन्ह। जाम्बवान्‌ उइठ गेलाह आ श्री कृष्ण सँ युद्ध करय लगलाह। हुनका दुनु केँ भयंकर बाहुयुद्ध २१ दिन धरि चलैत रहलन्हि। एम्हर द्वारिकावासी सात दिन धरि कृष्णक प्रतीक्षा कय हुनकर प्रेत क्रिया सेहो कय देलखिन। २२ म दिन जाम्बवान्‌ ई निश्‍चित क लेलैथ जे कि ई मानव नहि भऽ सकैत छथि। ई अवश्य परमेश्‍वर छथि । ओ युद्ध छोड़ि हुनकर प्रार्थना केलथिन्ह अौर अपन कन्या जाम्बवती केँ श्री कृष्ण केर अर्पण कय देलथिन्ह। भगवान् श्री कृष्ण मणि लैत जाम्बवतीक संग सभा भवन मे आइब, जनताक समक्ष सतजीत केँ ओ स्यमन्तक मणि सादर समर्पित कय देथिन्ह। सतजीत प्रसन्‍न भऽ अपन पुत्री सत्यभामा कृष्ण केर सेवा लेल अर्पण कय देलखिन । किछुए दिन मे दुरात्मा शतधन्बा नामक एकटा यादव, सतजित केँ मारि ओ मणि लय लेलक। सत्यभामा सँ ई समाचार सूनि श्री कृष्ण, बलराम केँ कहलथिन्ह, "हे भ्राताश्री! ई मणि हमरे योग्य अछि। एकरा शतधन्बा लऽ लेलक। ओकरा पकड़ू।" शतधन्बा ई सूनि ओ मणि, अक्रूर केँ दय देलखिन आओर रथ पर चढ़ि दक्षिण दिशा मे भागि गेलाह। कृष्ण-बलराम १०० योजन धरि हुनकर पांछाँ केलाह। वाद मे शतधन्बासंग मे मणि नहि देखि बलराम कृष्ण केँ फटकारऽ लगलाह, “हे कपटी कृष्ण ! अहाँ लोभी छी ।” कृष्ण केँ लाखों शपथ खेला पर बलराम शान्त नहि भेलाह तथा विदर्भ देश चलि गेलाह। कृष्ण घूरिऽ‌‍ कय जहन द्वारिका एलाह, तँ लोक सभ फेर कलंक देबऽ लगलैन्ह। जे ई कृष्ण मणिक लोभ सँ बलराम एहन शुद्ध भाय केँ फेर छलपूर्वक द्वारिका सँ बाहर कय देलाह। अहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण संतप्त रहय लगलाह। अहि बीच नारद (ओहि समयक पत्रकार) त्रिभुवनलोक मे घुमैत कृष्ण सँ मिलक लेल आयल छलाह। चिन्तातुर उदास कृष्ण केँ देखि पुछखिन “हे देवेश! किएक उदास छी?” कृष्ण कहलथिन्ह, ” हे नारद! हम बेरि-बेरि मिथ्यापवाद सँ पीड़ित भऽ रहल छी।” नारद कहलखिन, “हे देवेश! अहाँ निश्‍चिते भादो मासक शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र देखने होएब तेँ अपने केँ बेरि-बेरि मिथ्या कलंक लगैत ऐछ। श्री कृष्ण नारद सँ पूछलखिन, “चन्द्र दर्शन सँ किऐक ई दोष लगैत छैक।” नारद जी कहलखिन, “जे अति प्राचीन काल मे चन्द्रमा, गणेश जी सँ अभिशप्त भेलाह, जे अहाँक जे कियाे देखताह हुनको मिथ्या कलंक लगतैन्ह।” कृष्ण पूछलखिन, “हे मुनिवर! गणेश जी किऐक चन्द्रमा केँशाप देलखिन?” नारद जी कहलखिन, “हे यदुनन्दन! एक बेरि ब्रह्मा, विष्णु आओर महेश पत्नीक रुप मे अष्ट सिद्धि आओर नवनिधि केँ गणेश केँ अर्पण कय प्रार्थना केलखिन। गणेश प्रसन्न भऽ हुनका तीनू केँ सृजन, पालन आओर संहार कार्य निर्विघ्न रूप सँ करु ई आशीर्वाद देलखिन। ताहिकाल मे सत्यलोक सँ चन्द्रमा धीरे-धीरे नीचाँ आबि अपन सौन्दर्य मद सँ चूर भऽ गजवदन केँ उपहास केलखिन। तहन गणेश जी क्रुद्ध भऽ हुनका शाप देलखिन,“हे चन्द्र! अहाँ अपन सुन्दरता सँ नितरा रहल छी। आइ सँ जे अहाँ केँ देखताह, हुनका मिथ्या कलंक लगतैन्ह ।” चन्द्रमा कठोर शाप सँ मलीन भऽ जलमे प्रवेश कय गेलाह। देवता लोकनि मे हाहाकार मचि गेल । ओ सब ब्रह्माक पास गेलाह। ब्रह्मा कहलखिन अहाँ सब गणेश जी सँ जा कय विनती करू, वैह एकर उपाय बतेता। सब देवता पूछलखिन जे गणेशक दर्शन कोना होयत। ब्रह्मा बजलाह, “चतुर्थी तिथि केँ गणेश जी के पूजा करु।” सब देवताचन्द्रमा सँ कहलथिन्ह। चन्द्रमा चतुर्थीक गणेश पुजा केलाह। गणेश बालरुप मे प्रकट भऽ दर्शन देलखिन आओर कहलखिन,"चन्द्रमा हम प्रसन्‍न छी, वरदान माँगू ।” चन्द्रमा प्रणाम करैत कहलखिन, “हे सिद्धि विनायक! हम शाप मुक्‍त होइ, पाप मुक्‍त होइ, सभ हमर दर्शन करय।” गणेश जी कहलखिन जे हमर शाप व्यर्थ नहि जायत किन्तु शुक्ल पक्ष मे प्रथम उदित अहाँक दर्शन आओर नमन शुभकर रहत तथा भादोक शुक्ल पक्ष मे चतुर्थीक जे अहाँक दर्शन करताह हुनका लोकलांछणा लगतैन्ह । किन्तु यदि ओ “सिंहः प्रसेनं अवधीत्..”(जे की दर्शन मन्त्र ऊपर म देल ऐछ) इ मन्त्र केँ पढ़ैत दर्शन करताह तथा हमर पूजा करताह हुनका ओ दोष नहि लगतैन्ह। एवम् प्रकारेन्, श्री कृष्ण सेहो नारद सँ प्रेरित भऽ एहिव्रत केर अनुष्ठान कयलाह । तहन ओ लोक कलंक सँ मुक्‍त भेलाह । एहि चौठ तिथि आओर चौठ चन्द्र केँ जनमानस पर एहन प्रभाव पड़ल जे आइयो लोक चौठ तिथि केँ किछु नहि करऽ चाहैत छथि । कवि समाजो अपना काव्य मे चौठक चन्द्रमाक नीक रुप मे वर्णन नहि करैत छथि । कवि शिरोमणि तुलसी दासक सुन्दर काण्ड मे मन्दोदरी-रावण संवाद मे मन्दोदरीक मुख सँ अपन उदगार व्यक्‍त करैत कहे छथि,“तजऊ चौथि के चन्द कि नाई” अर्थात "हे रावण। अहाँ सीता केँ चौठक चन्द्र जकाँ त्याग कऽ दियहु। नहि तऽ लोक निंदा करत अहाँक नाश कय देतीह।" एतय ध्यान देबाक बात ई अछि जे जाहि चन्द्र केँ हम सब आकाश मे घटैत बढ़ैत देखैत छी ओ पुरुष रुप मे एक उत्तम दर्शन भाव लेने अछि।।
 प्रेम स कहियौ चौठचन्द्र भगवान की जय🙏🏼🙏🏼 
गणेश भगवान की जय🙏🏼🙏🏼 कहि के फूल अर्पित करू तदुपरांत जहिना पूजा केलहुं ओहि क्रम में बेराबेरी विसर्जन करी ।
विसर्जन मंत्र- नमो गणपत्यादि पंचदेवता: पूजिता: स्थ क्षमस्वं स्वस्थानं गच्छत।
विधवा- नमो विष्णो पूजितोऽसि प्रसीद क्षमस्व।
सुहागिन- नमो गौरि पूजितासि प्रसीद क्षमस्व।
नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्र पूजितोऽसि प्रसीद क्षमस्व स्वस्थानं गच्छ। 
 दक्षिणा द्रव्य जल से सिक्त कय तील जल लय मंत्र- नमोऽस्यां रात्रौ कृतेतद्रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्र पूजनकर्मप्रतिष्ठार्थमेतावद्द्रव्य मूल्यकहिरण्यमग्निदैवतंयथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे। कुश तील जल द्रव्य पर अर्पण कय। दक्षिणा प्रतिपन्न करी ओ स्वाच्छन्न देता। 
ॐ स्वस्ती'ति।।
 क्षमायाचना सपरिवार कलजोरी- हे चतुर्थी चंद्र हम त आहां के बच्चा छी यथासाध्य नैवेद्य फुल पान लय आहांक पुजा कयलो कोनो त्रुटि लेल क्षमा करब। 
तदुपरांत मड़ड उत्सर्ग कय भांगि आ प्रसाद वितरण करी।
पंडित भेट जाईथ त सर्वोत्तम नै त पिता/पती/पुत्र/भाई/कुटंब/संवंधी से उपरोक्त विधि से पुजन करी ।
चौठचन्द्र भगवान की जय🙏🙏

सम्पादक- आचार्य प्रभात झा {सिद्धान्त ज्योतिषाचार्य}

              सम्पर्क नम्बर- +91-9155657892


मंगलवार, 8 नवंबर 2022

चन्द्रग्रहण (Lunar Eclipse)- 2022

9 घंटे पहले लग जाएगा सूतक खग्रास चंद्रग्रहण कल, सुबह 8:00 बजे बंद हो जाएंगे मंदिरों के कपाट मिथिला. 8 नवंबर मंगलवार कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को संपूर्ण भारत में चंद्र ग्रहण लग रहा है। सभी राशि वाले जातकों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ेगा। चार राशि वालों के लिए यह चन्द्रग्रहण शुभ है वही आठ राशि वालो के लिए इसका अशुभ प्रभाव पड़ेगा । यह चन्द्रग्रहण जिनके लिए अशुभ प्रभावकारी है उन्हें इस चन्द्रग्रहण को नहीं देखना चाहिए एवं ग्रहण के पश्चात स्नान दान आदि अवश्य करना चाहिए । भारत में चंद्रग्रहण स्थानीय समय अनुसार अलग-अलग समय लग रहा है। 🌘चंद्रग्रहण उस खगोलीय स्थिति को कहते है जब चन्द्रमा पृथ्वी के ठीक पीछे उसकी प्रच्छाया में आ जाता है। ऐसा तभी हो सकता है जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा इस क्रम में लगभग एक सीधी रेखा में अवस्थित हों। इस ज्यामितीय प्रतिबन्ध के कारण चन्द्रग्रहण केवल पूर्णिमा को घटित हो सकता है। चन्द्रग्रहण का प्रकार एवं अवधि चन्द्र आसन्धियों के सापेक्ष चन्द्रमा की स्थिति पर निर्भर करते हैं। चाँद के इस रूप को 'ब्लड मून' भी कहा जाता है।  चन्द्र ग्रहण शुरू होने के बाद ये पहले काले और फिर धीरे-धीरे सुर्ख लाल रंग में तब्दील होता है। किसी सूर्यग्रहण के विपरीत, जो कि पृथ्वी के एक अपेक्षाकृत छोटे भाग से ही दिख पाता है, चंद्रग्रहण को पृथ्वी के रात्रि पक्ष के किसी भी भाग से देखा जा सकता है। जहाँ चन्द्रमा की छाया की लघुता के कारण सूर्यग्रहण किसी भी स्थान से केवल कुछ मिनटों तक ही दिखता है, वहीं चन्द्रग्रहण की अवधि कुछ घंटों की होती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रग्रहण को, सूर्यग्रहण के विपरीत, आँखों के लिए बिना किसी विशेष सुरक्षा के देखा जा सकता है, क्योंकि चन्द्रग्रहण की उज्ज्वलता पूर्ण चन्द्र से भी कम होती है। 🌒A total lunar eclipse will take place on Tuesday, November 8, 2022. The southern limb of the Moon will pass through the center of the Earth's shadow. Occurring only 5.8 days before apogee (apogee is on November 14, 2022), the Moon's apparent diameter will be smaller. The next total lunar eclipse won't take place until March 14, 2025. The eclipse will be completely visible over the Pacific and most of North America. It will be seen on the rising moon over Australia, Asia and in the far north-east of Europe, and the setting moon over South America and eastern North America. श्री जनार्दन ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र के संस्थापक ज्योतिषाचार्य प्रभात झा ने बताया कि चंद्रोदय के साथ शाम 4:59 बजे से ग्रहण प्रारंभ होगा। समाप्ति काल शाम 6:20 बजे रहेगा। सूतक 9 घंटे पूर्व यानी सुबह 8:00 बजे से माना जाएगा। बिहार, बंगाल, उड़ीसा तथा पूर्वोत्तर भारत में खग्रास रूप तथा शेष में खण्डग्रास रूप में चंद्रमा ग्रसा हुआ दिखाई देगा। सूतक काल के समय यह काम नहीं करें सूतक काल के समय मंदिरों के पट बंद रहेंगे। ग्रहणकाल में मूर्ति स्पर्श करना, अनावश्यक खाना-पीना, मैथुन, निद्रा, नाखून काटना नहीं करना चाहिए। ग्रहण काल में गर्भवती को फल-सब्जी काटना या चाकू - कैंची का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बाल-वृद्ध-रोगी एवं गर्भवती महिला को स्वास्थ्य के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। ग्रहण लगने से पहले की समय अवधि को अशुभ माना जाता हैं। इस समय अवधि में किसी भी तरह का कोई भी शुभ काम या मांगलिक कार्य नहीं किया जाना चाहिए। यदि इस सूतक काल के दौरान व्यक्ति कोई भी शुभ कार्य करता है, तो उसे फल की जगह अशुभ फल की प्राप्ति होती है। ग्रहण का राशि अनुसार प्रभाव
मेष- शारीरिक कष्ट, चोट, धननाश। वृष - धनहानि, आर्थिक परेशानी। मिथुन आर्थिक लाभ एवं शारीरिक सुख । कर्क- मानसिक सुख, शुभ । सिंह- अपमान, संतान पीड़ा। कन्या - शत्रु भय, दुर्घटना, व्यय । तुला- दाम्पत्य जीवन में कष्ट, विवाद । वृश्चिक - भौतिक सुख, भोग विलास। धनु - चिंता, व्यर्थ की भागदौड़ । मकर- व्यथा, मानसिक तनाव। कुंभ प्रगति, उत्साह, पुरुषार्थ वृद्धि। मीन- धनहानि, व्यर्थ का खर्च ।
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शनिवार, 24 सितंबर 2022

नवरात्रि पूजा का महत्व

*शारदीय नवरात्रि पर्व 26 सितंबर से, सुख-समृद्धि के साथ हाथी पर सवार होकर आएंगी मां भगवती* ========================== ✍🏻शारदीय नवरात्रि का पर्व 26 सितंबर सोमवार से 5 अक्टूबर विजया दशमी तक मनाया जाएगा।
श्री जनार्दन ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र के संस्थापक ज्योतिषाचार्य प्रभात झा जी ने बताये कि इस बार मां भगवती हाथी पर सवार होकर सुख-समृद्धि लेकर आ रही हैं, ऐसी मान्‍यता है कि यदि माता हाथी और नाव पर सवार होकर आती है तो साधक के लिए लाभकारी व कल्‍याण करने वाला होता है, नौ दिवसीय शारदीय नवरात्रि पर्व 26 सितंबर से 5अक्टूबर तक मनाया जाएगा। आचार्य प्रभात झा जी के अनुसार इस बार मां दुर्गा जी ब्रह्म योग में सुख-समृद्धि लेकर हाथी पर सवार होकर आएंगी, इस बार माता मंदिरों में कोरोना पाबंदियों से मुक्त पर्व की तैयारी की जा रही है। इससे हवन-पूजा और अनुष्ठान बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाएगा । माता मंदिरों में प्रतिदिन मां का नया श्रृंगार किया जाएगा। *सुख और समृद्धि का प्रतीक है हाथी* आचार्य प्रभात झा के अनुसार 26 सितंबर को प्रतिपदा तिथि रहेगी, सोमवार को माता रानी का आगमन हो रहा है। यदि सोमवार को मां का आगमन होता है तो वो हाथी पर माना जाता है, हाथी को सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि यदि माता हाथी और नाव पर सवार होकर आती है तो साधक के लिए लाभकारी व कल्‍याण करने वाला होता है यदि शनिवार और मंगलवार को नवरात्रि शुरू हो तो देवी जी का आगमन घोड़े में माना जाता है और गुरुवार और शुक्रवार को नवरात्रि के आरंभ होने पर मां का आगमन डोली में होता है। जबकि बुधवार को आगमन नौका पर बताया गया है। *माता मंदिरों में नवरात्रि की तैयारी शुरू* भारत देश के माता मंदिरों में नवरात्रि की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस अवसर पर सभी शक्ति पीठो के साथ दिव्य शक्तिपीठ में यज्ञ-हवन और अनुष्ठान होंगे। इस दौरान मां का नया श्रृंगार और पूजन किया जाएगा। *शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों का महत्व और पूजा*
*कलश स्थापना का मुहूर्त* शारदीय नवरात्रि के घटस्थापना या कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 06:11 बजे से सुबह 07:51 बजे तक है. वहीं कलश स्थापना का अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:48 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक है. *ज्योतिषाचार्य प्रभात झा* के अनुशार शारदीय नवरात्रि 2022 के नौ दिनों के महत्व इसके साथ ही नवदुर्गा के 9 रूपों की कृपा कैसे पाए। उनकी पूजा पाठ कैसे करें। इसके बारे में विस्तृत जानकारी ।
पहला दिन – मां शैलपुत्री : नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। यह मां दुर्गा का पहला अवतार हैं, और वह चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुंडली में चन्द्र अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। दूसरा दिन – मां ब्रह्मचारिणी: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। यह मंगल ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है। यदि पूरे समर्पण के साथ इनकी पूजा की जाती है, तो मंगल के सभी प्रतिकूल प्रभावों को दूर कर सकते हैं। कुंडली में मंगल अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। तीसरा दिन – मां चंद्रघंटा : नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे रूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। यह शुक्र ग्रह पर शासन करती है और साहस प्रदान करती है। कुंडली में शुक्र अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। चौथा दिन – मां कुष्मांडा: नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे अवतार, मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। जो सूर्य ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके भविष्य की रक्षा करती है। कुंडली में सूर्य अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। पांचवां दिन – मां स्कंदमाता: नवरात्रि के पांचवे दिन मां दुर्गा का पांचवे रूप, मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। जो की बुध ग्रह पर शासन करती है। अपने भक्तों पर हमेशा कृपा करती है। कुंडली में बुध अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। छठा दिन – मां कात्यायनी : नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के छठे रूप, मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। यह बृहस्पति ग्रह पर शासन करती है। इनके भक्त उनके साहस और दृढ़ संकल्प से लाभान्वित होते हैं। कुंडली में गुरु अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। सातवां दिन – मां कालरात्रि : नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा का सातवें रूप, मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह शनि ग्रह पर शासन करती है। इसके साथ ही यह साहस का प्रतिनिधित्व करती है। कुंडली में शनि अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। आठवां दिन – मां महागौरी : नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें रूप मां महागौरी की पूजा की जाती है। यह राहु ग्रह पर शासन करती है। यह हानिकारक प्रभावों और नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करती है। कुंडली में राहु अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। नौवां दिन – मां सिद्धिदात्री : नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा के आठवें रूप, मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह केतु ग्रह पर शासन करती हैं। ये ज्ञान प्रदान करती हैं। कुंडली में केतु अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो इनकी पूजा पाठ करें। ♧ नवरात्रि का आठवां दिन (अष्टमी) दिनांक: 03 अक्टूबर 2022, सोमवार। त्योहार के अन्य नाम:महाष्टमी व्रत, दुर्गा अष्टमी, महागौरी पूजा, अन्नपूर्णा अष्टमी, संधि पूजा। पसंदीदा फूल: रात में खिलने वाली चमेली, मोगरा का फूल इनको बहुत पसंद है । दिन का रंग: बैंगनी। मंत्र: ‘ॐ देवी महागौरी नमः। ♧ नवरात्रि का नौवां दिन (महानवमी) दिनांक : 04 अक्टूबर 2022, मंगलवार। त्योहार के अन्य नाम :महानवमी व्रत, त्रिशूलनीपूजा, सिद्धिदात्री पूजा। पसंदीदा फूल: चंपा का फूल इनको बहुत पसंद है। दिन का रंग: मयूरी हरा। मंत्र: ‘ॐ देवी सिद्धिदात्री नमः’ ♧ नवरात्रि का अंतिम दिन (विजय दशमी) दिनांक: 05 अक्टूबर 2022, बुधवार। त्योहार के अन्य नाम: अपराजिता पूजा, दशहरा, दुर्गा विसर्जन,जयन्ती धारणा, नवरात्रव्रतपारणम् । *कुंडली विश्लेषण, कुंडली मिलान, पुत्र प्राप्ति, विवाह में देरी, वैदिक पूजा पाठ, हवन, वैदिक मन्त्र जप एवम सभी प्रकार के मांगलिक कार्यक्रम हेतु सम्पर्क करें ।* *दुर्गा पूजन, दीपावली पूजन, हेतु सम्पर्क करें* *जन्म कुंडली विश्लेषण हेतु जन्म तारीख, जन्म समय, जन्म स्थान अनिवार्य* *ज्योतिषाचार्य पं. प्रभात झा, सीतामढ़ी, बिहार* *सम्पर्क नं•:- +91-9155657892*

बुधवार, 21 सितंबर 2022

विवाह की दिशा, दशा और ससुराल की दूरी

विवाह की दिशा, दशा और ससुराल की दूरी
विवाह की दिशा और ससुराल की दूरी ससुराल की दूरीः- सप्तम भाव में वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो, तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी। यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों, तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी। यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो, तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा। अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो, तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा। यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो, तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा। शादी की आयुः- यदि जातक या जातिका की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो, तो शादी 17 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होता है। सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हो तो शादी 27-28 वें वर्ष में होगी। सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त होकर चर राशि हो तो जातिका का विवाह दी गई आयु में संपन्न हो जाता है। यदि किसी लड़की या लड़के की जन्मकुंडली में बुध स्वराशी मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो, तो विवाह बाल्यावस्था में होगा। आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझना चाहिए। परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर नहीं होनी चाहिए। अनुभव में देखा गया है कि लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी हुई है। Fb.com/Pt.PrabhatJha कब होगाः- यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं। जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें। योगफल विवाह का वर्ष होगा। सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योगफल विवाह का वर्ष होगा। पति का अपनाः- लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है। दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो या दशमेश से युक्त या दृष्ट हो, तो पति का अपना मकान होता है। पति का मकान बहुत विशालः- राहु, केतु, शनि से भवन बहुत पुराना होगा। मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा। सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, सीमेंट का दो मंजिला होगा। अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो तो मकान बहुत विशाल होगा। विदेश में पति या ससुरालः- यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा। कुंडली में जहां शुक्र स्थित है उस से सातवें स्थान पर जो राशि स्थित है उस राशि के स्वामी की दिशा में ही विवाह होता है। ग्रहों के स्वामी व उनकी दिशा निम्न प्रकार हैः- राशि स्वामी दिशा मेष, वृष्चिक मंगल दक्षिण वृष, तुला शुक्र आग्नेय कोण मिथुन, कन्या बुध उत्तर कर्क चंद्रमा वायव्य कोण सिंह सूर्य पूर्व धनु, मीन गुरु ईशान मकर, कुम्भ शनि पश्चिम मतान्तर से मिथुन के स्वामी राहु व धनु के स्वामी केतु माने गए हैं तथा इनकी दिशा नैऋत्य कोण मानी गयी है। उदाहरण के लिए किसी कन्या का जन्म लग्न मेष है व शुक्र उसके पंचम भाव में बैठे हैं तो शुक्र से 7 गिनने पर 11 वां भाव आता है, जहां कुम्भ राशि है। इसके स्वामी शनि हैं। राशि की दिशा पश्चिम है। इसलिए इस कन्या का ससुराल जन्म स्थान से पश्चिम दिशा में होगा। कन्या के पिता को चाहिए कि वह इस दिषा से प्राप्त विवाह प्रस्तावों पर प्रयास करें ताकि समय व धन की बचत होकर सहायता मिल जाती हैं। <आचार्य_प्रभात_झा>|<+91-9155657892> विवाह दिशा निर्धारण में विद्वानों के दो मत हैं। प्रथम मत के अनुसार शुक्र के सातवें स्थान का स्वामी जिस दिशा का अधिपति होता है, उसी दिशा में कन्या (बेटी) का विवाह होता है। दूसरे मत के अनुसार सप्तमेश जिस ग्रह के घर में बैठा होता है, उस ग्रह की दिशा में ही कन्या का विवाह होता है। प्रकारान्तर से दोनों मत मान्य हैं। प्रथम मत कभी-कभी गलत भी हो सकता है परन्तु दूसरा मत बड़ा ही सटीक है। अतः इसी मत के विषय में यहां विस्तार से बताया जा रहा है। सप्तमेश अगर सूर्य हो और वह अपनी ही राशि में बैठा हो अथवा कोई भी ग्रह सप्तमेश होकर सिंह राशि में बैठा हो तो पूर्व दिशा में विवाह होगा अथवा इसके ठीक उल्टा पश्चिम दिशा में होगा। सप्तमेश अगर कर्क राशि में बैठा हो तो पश्चिमोत्तर दिशा में अर्थात वायव्य कोण में अथवा इसके ठीक विपरीत अग्निकोण (पूर्व-दक्षिण के कोण) पर विवाह का योग होता है। सप्तमेश यदि मंगल की राशि मेष अथवा वृश्चिक में बैठा हो तो दक्षिण दिशा में अथवा इसके ठीक विपरीत उत्तर दिशा में विवाह होता है। सप्तमेश यदि बुध की राशि मिथुन अथवा कन्या में बैठा हो तो उत्तर अथवा दक्षिण दिशा में कन्या का विवाह होना बताया जाता है। सप्तमेश अगर गुरू की राशि धनु अथवा मीन में हो तो विवाह ईशान कोण अर्थात पूर्वोत्तर (नैत्रृत्य) दिशा में विवाह होने का योग बनता है। सप्तमेश यदि शुक्र की राशि वृष या तुला में स्थित हो तो विवाह आग्नेय (पूर्व-दक्षिण) अथवा वायव्य (पश्चिमोत्तर) दिशा में होता है। सप्तमेश अगर शनि की राशि मकर अथवा कुम्भ में स्थित हो तो पश्चिम दिषा अथवा ठीक उल्टा पूर्व दिशा में विवाह होना चाहिए। दिशा निर्धारण के बाद कन्या के ससुराल की दूरी को इन विधियों से जाना जा सकता है। इसके लिए सप्तमेश अंशों को देखा जाता है तथा सूर्यादि ग्रहों की गति को भी जानना आवश्यक होता है। सप्तमेश जितनी यात्रा कर चुका हो, उतने ही किलोमीटर की दूरी पर विवाह हो सकता है। अंश का निर्धारण बहुत ही सावधानी पूर्वक किया जाता है। सप्तमेश चन्द्रमा से जितने घर आगे होगा, उतने ही प्रति घर तीस डिग्री के हिसाब से दिशा में परिवर्तन होगा। सप्तमेश जिसके गृह में बैठा होगा, उसी के अनुसार वर या कन्या का घर होगा। मान लें कि सप्तमेश शनि स्वगृही है या अन्य कोई भी ग्रह सप्तमेश होकर शनि के घर में बैठा हो तो निश्चित रूप से वर या कन्या का घर टूटा-फूटा या पुराना खण्डहर जैसा होगा अथवा ऐसा होगा जिसमें नौकर रहते थे या निंदनीय कार्य करने वाले लोग रहते रहे थे। यह मात्र एक उदाहरण था। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के प्रभाव के कारण भी होता है। यदि सप्तमश सूर्य के घर में बैठा हो तो ससुराल वाले घर के समीप शिव का मन्दिर अवश्य होगा। सप्तमेश अगर कर्क राशि (चन्द्र के गृह) में बैठा हो तो कन्या का ससुराल किसी नदी या जल के समीप स्थित होगा। उस मकान में अथवा मकान के निकट दुर्गा जी का मंदिर अवश्य होना चाहिए। यह भी संभव है कि उस स्थान के निकट शराब या दवा निर्माण का भी कार्य होता हो। कन्या के ससुराल के लोग दुर्गा माता के भक्त होंगे। सप्तमेश अगर (मंगल के गृह) मेष अथवा वृश्चिक में बैठा हो तो कन्या के ससुराल में या उसके घर के निकट अग्नि से संबंधित व्यवसाय (रेस्टोरेन्ट, चाय की दुकान) होगी। सप्तमेश यदि (बुध के घर) मिथुन अथवा कन्या राशि में बैठा हो तो कन्या के परिवार वाले पढ़े-लिखे एवं विष्णु के भक्त होते हैं। कन्या की सास या ससुर का चरित्र संदिग्ध होता हैं। कन्या को सास-ससुर से बचकर ही रहने की सलाह ज्योतिष शास्त्र देता है। सप्तमेश अगर वृहस्पति की राषि धनु अथवा मीन में बैठा हो तो कन्या का विवाह किसी तीर्थ स्थल में होना संभव होता है। ससुराल के लोग शिव भक्त होते हैं सप्तमेश अगर वृहस्पति की राशि धनु अथवा मीन में बैठा हो तो कन्या का विवाह किसी तीर्थ स्थल में होना संभव होता है। ससुराल के लोग शिव भक्त होते हैं। सप्तमेश अगर शुक्र की राशि वृष अथवा तुला में बैठा हो तो जातक के ससुराल के निकट कोई नदी होती है तथा ससुराल पक्ष के लोग देवी के भक्त होते हैं। ससुराल के व्यक्ति व्यापारी तथा खुशहाल होते हैं। सप्तमेश भले ही किसी भी राशि में बैठा हो और वह राहू से संयुक्त हो तो ससुराल के लोग पितृ पक्ष मे कमजोर होते हैं। अगर सप्तमेश केतु से प्रभावित हो तो ससुराल के लोग पितृ पक्ष से आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं। विवाह के पश्चात कन्या काफी सुखी रहती है तो वह मालकिन बनकर ससुराल वालों के हृदय पर राज्य करती रहती है। भूत, भविष्य, वर्तमान सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर एवं समस्त समस्याओं का समाधान केवल फोन पर समय शायं 04.00 से रात्रि 08:00 तक -ः आपका संकट निवारण ही हमारा लक्ष्य :- भाग्य, रोजगार, विवाह, संतान, परीक्षाफल, ऋणमुक्ति, नष्टवस्तु (लाभालाभ), भागे व्यक्ति, रोग (परकृत बाधा- संकट किस कारण से), हारजीत, नौकरी, वर्षफल, अन्य सभी प्रश्नों के उत्तर एवं अक्समात् आये संकट का कारण और उसका सही समाधान आप ज्योतिष के द्वारा प्राप्त कर लाभान्वित हो सकते हैं। सम्पादक:- आचार्य प्रभात झा सीतामढ़ी बिहार https://Fb.com/Pt.PrabhatJha व्हाट्सएप- +91-9155657892 गूगल पे - +91-9155657892

रविवार, 29 मई 2022

वट सावित्री व्रत

<वटसावित्री =पूजा- व्रत - कथा (नव विवाहित कनिया )
सामाग्री – 1. बियन-8 टा 2. डाली -8 टा 3. बोहनी-1 4. अहिवात 5. उङद दाल के बङ-14 6. सुतरी 7. सरवा -२ 8. मईटक नाग-नगीन 9. केरा क पात 10. लावा 11. एकटा सरवा में दही 12. मुंग (फुलायल नवेद्यक वास्ते ) 13. चना फुलायल 14. लाल कपङा 15. कनिया -पुतरा 16. साजी 17 . चावल (अरवा चौर ) 18. जनॐ -एक जोङ आ गोटा सुपारी 19. फल ,फूल ,मिठाई 20. कांच हरिद (हल्दी),दुईब,गोटा धनिया 21 बिन्नी (ललका कपङा में चौर,दुईब , हरिद बांधल) 22 .दूध विधि एक दिन पहिने कनिया नहा धोय कय अरवा भोजन करथिन। साँझ खन भगवती ,महादेव ,ब्राह्मण ,हनुमान और गौरी कय गीत गावि, दुईब ,कांच हल्दी ,धनिया (कनी )मिला क गौर बनत,जकरा ढउरल सरवा पर एकटा सिक्का पर गौरी राखि पान क पात स झापि ,पान क पात क ऊपर सिंदूरक गद्दी राखि ललका कपडा स झापि भगवति लग राखि देवेइ । उङद दालि के फुला के १४ टा बड़ पकैल जायत ,जकरा सरेला पर सुतरी में गांथल जायत (बिना सुइया के) बड़ गुथल सुतरी के बोहनी के मुँह पर बांधल जायत । केरा के पात पर सिन्दूर आ काजर सँ बिष-विषहारा लिखल जायत । राति खन कनी मुंग आ बेसी बूंट (कला चना ) फुलय ल पड़तय । वट सावित्री पूजा क दिन नव कनियाँ नहा धो क सासुर स आयल नव कपङा पहिर के श्रृंगार कय ,खोइछ लय ,भगवती क पूजा कय ,हाथ में साजी (जाही में कनिया पुतरा रहत ),आ माथ पर बोहनी (जाही में लाबा भरल रहत आ जकरा मुँह पर सुतरी में बांधल 14 टा बङ रहत )लय के भगवती के गोङ लागी सब संगे बङ क गाछ तर जेती। गाछ तर बोहनी में राखल लाबा कर के पात पर राखि देथिन आ ओही बोहनी में पानि भैर देथिन गाछ तर अरिपन रहत ,एकटा अरिपन के ऊपर 7 टा बिअनि रहत ,आ सात टा डाली में फुलायल बूंट ,फल ,मिठाई राखल रहत। गाछ तर अहिवात जरायल जैत। एक टा डाली में चौर ,सुपारी जनऊ,पैसा फल -मिठाई राखल रहत जे पूजा के बाद पंडित क य देल जायत। आम क पात पर 60(साइठ )ठाम फुलायल मुंग आ फल -मिठाई के नवेद्य लगायल जायत। एकटा बियनि पर आ एक टा आम पर पांच टा सिन्दूर लगा बङ के गाछ के जैङ में ‍‌‍‍राखल जैत। अरिपन पर विष-विषहारा लिखल पात राखि ओही पर मईटक विष -विषहारा राखल जायत। कनिया एक टा बङ क पात केश में खोसती। सबटा ओरिआन बाद कनियाँ गौरी सबहक(सासूर बला,नहिअर बला जे राति में बनल आ विवाह बला ) आगु नवेद्य राखि फूल आ सिन्दूर लय गौरी पूजति। ओकरा बाद बिन्नी हाथ में लय जांघ तर बोहनी राखि कथा सुनति(कथा ब्लॉग में नीचां उपलब्ध भेटत )। कथा सुनला के बाद कनिया साङी के खूंट पर गाछ तर रखलाहा आम आ एक टा सिन्दूर क गद्दी ल के मौली धागा बांधैत गाछ के चारू तरफ पांच बेर घूमती। फेर गाछ तर राखल बियनि से गाछ के तीन बेर होंकैत गला मिलति। आब पुतरा के हाँथों कनिया के सिंदूरदान हेतई (कनिये करेती)। ओकरा बाद सबटा नवेद्य उसगरति ,आ विष-विषहरा के दूध लाबा चढेति। बोहनी में बांधल सबटा बङ के वायां हाथ के अंगुठा और अनामिका स तोरी के एक बेर आगु आ एक बेर पाछु फेकैत फकरा पढती-बङ लिय(पाछु ),मर दिय (आगु )। ओकरा बाद माथ पर फेर बोहनी उठेती ,हाथ में साजी लेती आ भगवती घर में एती। गाछ तर राखल डाली सेहो उठी के भगवती घर में रखायत। भगवती के गोङ लगी 7 टा अहिवाती के डाली देथिन आ सब पैघ सब के गोङ लागी आशीर्वाद लेती। कथा एक टा गाम में एकटा ब्राह्मण अपना कनियाँ और सात टा पुत्र संगे खुशी खुशी रहेत छलाह, हुनका घर के चौका में चिनवार लग एक टा नाग-नागिन अपन बिल बना क रहेत छल । ब्राह्मण क कनिया साँपक डरे प्रतिदिन भात पसेला क बाद ओकर गरम माँर साँप क बिल में ढारि दैत छलईथ जाहि सं साँप क सबटा पोआ(बच्चा ) सब मरि जाईत छल , निरंतर अपन पोआ सब के मरला सं क्रोधित भय नाग –नागिन एक दिन ब्राह्मण के श्राप देलखिन जे “जेना अहाँ हमार बच्चा सब के मारलउ तहिना अहाँ के वंश के सबटा बच्चा सब साँप के कटला से मरि जायत “। समयांतराल में ब्राह्मण के बङका बेटा के हर्षो- उल्लास सं विवाह भेलनि , विवाहोपरांत ब्राह्मण बेटा कनियाँ के द्विरागमन करा अपना घर दिश बिदा भेला , रास्ता में किछु देर क वास्ते सुस्तेवा लेल एक टा वट वृक्ष क नीचा में दुनू बर कनियाँ बैसलाह , ओहि गाछ के जैङ में एकटा धोधैर चल जाहि में नाग-नागिन रहित छलईथ । नाग-नागिन धोधैर सं निकलि दुनू बर कनियाँ के डैस लेलखिन जाहि सं दुनू के मृत्यु भय गेल, ब्राह्मण क घर में दुःख के पहाङ टूटि परल । अहिना क कय ब्राहमण के छ्हो पुत्र के एक एक करि कय कसर्प-दोष सं मृत्यु भय गेलनि । ब्राह्मण –ब्राह्मणि चिंतित रहअ लगला आ अपन छोटका बेटा के हमेशा अपना आँखि के सामने रखैत छलैथ , बेटा के हमेशा झापि-तोपि के रखैत छलैथ कि कतहुँ साँप –बिच्छु ने काटि लई । ब्राह्मण क बेटा जखन पैघ भेला त धनोपार्जन हेतु घर से बाहर जेबा लेल जिद करय लगला । पहिने त हुनकर माता-पिता हुनका बाहर भेजवा लेल तैयार नई होईत छला ,फेर एही शर्त पर राजी भेला कि हमेशा अपना संगे एकटा छाता और जूता रखता, शर्त मानी ब्राह्मण बेटा घर सं बिदा भेला जाईत-जाईत एकटा गाम लग पहुचला, गाम के बाहर एकटा धार छल ,ब्राह्मण बेटा जूता पहिर लेलथि आ धार के पार करअ लगला, तखने गाम के किछु लङकी सभहक झुण्ड सेहो धार पार करैत छल सब सखि सब ब्राह्मण के बेटा के जुत्ता पहिर पानि में जाईत देखि ठठहा के हंसअ लगली आ कह लगली कि – “हे देखू सखि सब केहन बुरबक छै ई ब्राह्मण बेटा पानि में जूता पहिरने अईछ “ ओहि झुण्ड में एकटा सामा धोबिन के बेटी सेहो छल से सखि सबके अपन तर्क देलखिन जे –हे सखि नई बुझलौं ,ब्राह्मण बेटा पानी में जूता एही दुआरे पहिरने ऐछ जाहि सं पनि में रहै बला साँप –कीङा ओकरा पैर मे नइ काटि लइ” ब्राह्मण बेटा ओहि लङकी के तर्क सुनि चकित भेला । धार पार कय सब गोटा आगु बढ़ल ,धुप बेसी छल मुदा ब्राह्मण बेटा छाता अपना कांख तर दबने रहल, सब सखि सब मुँह झाँपी मुस्कुरैत रहलि आ सोचैत छलि ,जे एतेक धुप छै आ ई मानुष छत्ता कांख तर दबेने ऐछ , बर रौउद छल आ गाम क उबर-खाबङ मैइटक रस्ता ,सब गोटा चलैत-चलैत थाईक गेल । रस्ता कात में एकटा बरका विशाल बङ क गाछ छल जकरा देख सब गोटा ओहि छाया में विश्राम करवा हेतु गाछ तर बैस रहल । ब्राह्मण बेटा जखने गाछ तर बैसला अपन कांख तर दबैल छत्ता खोइल ताइन लेलइथ । सब सखि सब फेर जोर सं हंस लागलि आ कह लागलि जे – “देखिअऊ इ मानुष के धुप छल त छत्ता कांख तर देवेने छल आ जखन गाछ तक छाया में बैसल ऐछ त छत्ता तनने ऐछ “सामा धोबिन क बेटी जे ब्राह्मण बेटा के बार ध्यान सं देख रहल छालैथ,फेर अपन तर्क देलखिन जे –“ हे सखि सब अहाँ सब फेर नई बुझलौं ,इ ब्राह्मण बेटा गाछ पर रहै बला साँप-कीङा सं अपना क बचबै लेल गाछ तर छत्ता तनने ऐछ “ ब्राह्मण क बेटा जे बरि काल सं सामा बेटी के तर्क सुनैत छला ,ओकर बात सं ततेक प्रभावित भेला कि सोचलैथ कि अगर विवाह करब त एही चतुर कन्या सं करब ।ब्राह्मण बेटा गाम क धोबिन लग गेला आ धोबिन सामा सं कहलखिन जे हम आहाँ क चतुर बेटी सं विवाह कर चाहैत छी , सामा धोबिन तैयार भय गेलि आ खुशी –खुशी दुनू के विवाह कय देलखिन । जखन विदागरी क समय आयल त सामा धोबिन कहलखिन जे –“हे बेटी हम त गरीब छी ,हमरा लग धन –दौलत किछु नहि अछि, अहाँ के हम विदागरी में कि दिय ?” सामा क बेटी ताहि पर उत्तर में कहलखिन जे –“हे माय अहाँ हमरा किछु नय मात्र कनी धान क लाबा ,कनी दूध ,बोहनी आ एक ता बियन दिय आ आशीर्वाद दिय जे हम अपना पति आ हुनकर वंश वृद्धि में सहायक होइयन ” सामा धोभिन सब चीज जे हुनकर बेटी कहलकैन ओरिआन कय क देलखिन आ आशीर्वाद दय दुनू बर कनियाँ के बिदा केलखिन ।ब्राह्मण बेटा अपना कनियाँ क लय अपना गाम दिश चल लगला ,चलैत-चलैत जखन दुनू गोटा थाईक गेला त विश्राम करवा लेल एक टा बङ गाछ के नीचा में रुकि गेला I सामा धोबिन क बेटी अपन माय क देल सबटा समान गाछ के निचा में राखि अपना वर संगे आराम करय लगलि । ओही बङ के जइङ में एकटा नाग अपना नागिन बिल में संगे रहैत छल ,गाछ के जैङ लग दूध, लाबा आ बोहनी में राखल पानि देखि नाग कय भूख और प्यास जागृत भय गेल आ नाग अपना बिल सं निकलि बाहर जेवाक लेल व्यग्र भ गेला । नागिन बार बार मना कर लागलैथ किन्तु नाग नइ मानलैथ आ बाहर आबि जहिना बोहनी में राखल पानी के पिबा लेल ओहि में मुहँ देलखिन, धोबिन बेटी नाग समेत बोहनी के हाथ सं पकङि अपना जाँघ तर में दाबि क राखि लेलैथ । नाग कतबो प्रयाश केलैथ निकलि न हि पेलैथI जखन बरि काल बितला क बादो नाग घुरि क नहीं अयलाह त नागिन बाहर निकललि आ देखलखिन जे नाग के त एकटा नव कनियाँ पकङने अछि । नागिन ओकरा से कहलखिन कि नाग क छोङि दिअऊ ,परन्तु सामा बेटी नइ मनलखिन नागिन के निरंतर अनुनय –विनय क बाद धोबिन बेटी एकटा शर्त राखलखिन जे –“हे नागिन हम अहाँ के पति नाग राज के तखने छोङबनि जखन अहाँ हमरा पति आ हुनकर वंश के सर्प-दोष सं मुक्त करब संगहि हुनकर छबो भाई के जे मरि गेल छैथ के पुनः जीवित करब “ नागिन विवश छलि धोबिन बेटी के शर्त मानवा लेल नागिन स्वर्ग सं अमृत अनलेइथ आ ब्राह्मण के सबटा पुत्र ,पुत्रवधु के जीवित कय सर्प –दोष सं मुक्त कय सब के आशीर्वाद देलखिन तखन जा क धोबिन बेटी नाग के छोङलखिन और अपन करनी लेल क्षमा माँगी नाग –नागिन के प्रणाम केलैथ तखन नाग नागिन ब्राह्मण के सबटा पुत्र आ पुत्रबधु सबके आशीर्वाद दैत कहलखिन –“जेष्ठ मॉस के अमावश्या दिन विवाहित कनियाँ सब ज्यों बङ के गाछ के पूजा करति आ बिष-विषहारा के दूध लाबा चढ़ा हुनकर पूजा करती तँ हुनकर सब के सुहाग अखण्ड रहतेंन “ नाग –नागिन सं आशीर्वाद लय ब्राह्मण क सातों पुत्र आ सातों कनिया जखन अपना घर पहूँचला त ब्राह्मण –ब्राह्मणि के प्रसन्ता के नई त कुनु ओर रहलनि न छोङ आ दुनू गोटा धोबिन सामा के बेटी के बहुत बहुत आशीर्वाद देलखिन ओकरा बाद सब गोटा प्रसन्ता पूर्वक रहअ लगला । समाप्त १.बोहनी आ सुतरी सं बांधल १४ टा बङ
२.केरा पात पर विष- विषहरा
३. विष -विषहरा
४.सरवा के ऊपर पान क पात पर गौर
सम्पादक:- आचार्य प्रभात झा (सिद्धान्त ज्योतिषाचार्य ) सम्पर्क नम्बर:- +91-9155657892 https://princejyotishkendra.blogspot.com https://Fb.com/Pt.PrabhatJha

सोमवार, 6 सितंबर 2021

चौठचन्द्र/चौरचन पूजा और कथा

 चौठचन्द्र चौरचन पूजा

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नम:! अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोपिवा।

य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सवाह्याभ्यन्तर: सुचि सुचि।।

नमः! पुण्डरीकाक्ष: पुनातु। गंगा नारायण हरि-हरि ।

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तेकुशा तील जल लय संकल्प मंत्र-

नमोऽस्यां रात्रौ भाद्रे मासि शुक्ल पक्षे चतुर्थ्यां तिथौ अमुक गोत्राया: ममाऽमुकीदेव्या: ।सकल कल्याणोत्पत्तिपूर्वक धनधान्यदि समृद्धि सकल मनोरथ सिद्ययर्थं यथाशक्ति गंधपुष्प धूपदीप ताम्बूल यज्ञोपवित वस्त्रनानाविध-नैवेद्यादिभि: रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्रपूजनं तत्कथाश्रवणं चाहं करिष्ये।


गणपत्यादि पंचदेवता पूजन-


अक्षत लय-नमो गणपत्यादि पंचदेवता: इहागच्छत इह तिष्ठत।कहि पात पर एककात राखि दी।


अर्घा में जल लय- एतानि पाद्यादीनि एषोर्घ: नमो गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।


फूल में चानन लगाके- इदमनुलेपनं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नमः ।


अक्षत लय-इदमक्षतं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। 


फूल लय-इदं पूष्प गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। 


बेलपात लय-इदं विल्वपत्रं गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:। 


दूबि लय-इदं दुर्वादलम् गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।

जल लय-एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बुलयथाभाग नानाविध नैवेद्यानि गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।नैवेद्य पर। 

जल लय-इदमाचीनीयं नमो गणपत्यादि पंचदेवता भ्यो नम:।


विधवा स्त्री तील लय- नमो भगवत् भगवान श्रीविष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ। पूजा के बगल में पात पर राखू।

जल लय-एतानि पाद्यादीनि एषोर्घ: नमोभगवते श्रीविष्णवे नम:।पूजा पात पर चढादी। अहिना फूल तुलसीपात आदि सौं पंचोपचार पूजा करी।


सधवा स्त्री गौरी पूजा करथि-


अक्षत लय-नमो गौरि इहागच्छ इह तिष्ठ।


जल लय-एतानि पाद्यादीनि नमो गौर्ये नम:। 


चानन लय-इदमनुलेपनं नमो गौर्ये नम:। 


सिंदुर लय-इदं सिन्दूरमनमो गौर्ये नम:। 


अक्षत लय-इदमक्षतं नमो गौर्ये नम:। 


फूल लय-इदं पुष्पं नमो गौर्ये नम:।


दुबि लय- इदं दुर्वादलम नमो गौर्ये नम:।


बेलपात लय- इदं विल्वपत्रं नमो गौर्ये नम:। 


जल लय-एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बुलयथायदिभाग नानाविध नैवेद्यानि नमो गौर्ये नम:।नैवेद्य पर उत्सर्ग करी।  

जल लय-इदमाचीनीयं नमो गौर्ये नम:।


चौठचन्द्र पूजा- अक्षत लिय-नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्र  इहागच्छ इह तिष्ठ।पात पर राखू।


उजर फूल लिय- श्वेतांबरं स्वच्छतनुं सुधांशु चतुर्भुजं हेमविभूषणाढ्यम्।वरं सुधा दिव्यकमण्डलुञ्च करैरभीतिञ्च दधानभीडे।।एष पपुष्पाञ्जलि।


जलक अर्घ्यदान-सोमाय सोमेश्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम:।


एतानि पाद्यादीनि एषोऽर्घ्य: नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम:।


चानन लय-मलयाद्रिसमुद्भूतं श्रीखंडं त्रिदशाप्रियम्। सर्वपापहरं सौख्यं चंदनं मे प्रगृह्यताम्।


चानन लय- इदमनुलेपनं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम:।


अक्षत लय-इदमक्षतं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम:।


उजर फूल लय - त्रैलोक्यमोदकं पुष्पं शुक्ल पुष्पं मनोहरम्।दिव्यौषधि क्षपानाथ गृह्यतां च प्रसीद मे।एतानि पुष्पाणि नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।


बेलपात लय-इदं विल्वपत्रं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नमः।


दुबि लिय-इदं दुर्वादलम नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नमः।


यज्ञोपवित लय- सुसंस्कृतं चतुर्वेदैर्द्विजानां भूषणं वरम्।यज्ञोपवितंदेवेश कृपया मे प्रगृह्यताम्।इमे यज्ञोपविते वृहस्पतिदैवते नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।


वस्त्र लय- तन्तुसन्तानसम्भूतं कलाकोशलकल्पितम्। सर्वाङ्गभूषणश्रेष्ठं वसनं परिधीयताम्।।इदं वस्त्रं वृहस्पतिदैवतं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।


नैवेद्य- नैवेद्यं गृह्यतां देव भर्क्ति मे ह्यचलां कुरू।ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परांङ्गतिम।। 

एतानि गंधपुष्प धूपदीपसदधिपक्वान्नादि नानाविध नैवेद्यानि नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।


पुंगीफल- पूंगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्। कर्पूरादिसमायुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्।।एतानि ताम्बूलानि।


धूप- गन्धभारवहं दिव्यं नानावस्तुसमनवितम्। सुरासुरनरानन्दं धूपं देव गृहाण मे।। एष धूप: नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।


कलशदीपदानम- मार्तण्डमण्डलाखण्डचन्द्रबिम्बाग्निदीप्तिमान्। विधात्रा देवदीपोऽयं निर्मितस्तेऽस्तु भक्तित:। एष कलशदीप: नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।


शंख में  फल फूल दूध लय- अत्रिनेत्रसमुद्भूत क्षीरोदार्णवसंभव।गृहामार्घ्य मया दत्तं रोहिण्या सहितप्रभो ।इदं दुग्धार्घ्यं नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्राय नम :।


डाली लय चंद्र दर्शन मंत्र-


सिंह प्रसेन मवधीत्सिंहो जाम्बवताहत :! 

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक :!


प्रणाम मंत्र-


नम: शुभ्रांशवे तुभ्यं द्विजराजाय ते नम ।

रोहिणीपतये तुभ्यं लक्ष्मीभ्रात्रे नमोऽस्तु ते । ।


दही छाँछी लय प्रणाम मंत्र -


दिव्यशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसंभवम्! 

नमामि शशिनं भक्त्या शंभोर्मुकुट भूषणम्! !


प्रार्थना मंत्र -


मृगाङ्क रोहिणीनाथ शम्भो : शिरसि भूषण ।

व्रतं संपूर्णतां यातु सौभाग्यं च प्रयच्छ मे । ।

रुपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवन् देहि मे।

पुत्रोन्देहि धनन्देहि सर्वान् कामान् प्रदेहि मे।।

तदुपरांत स्यमन्तक मणी जाम्बवान पुत्र सुकुमार पर आधारित कथा ध्यान मग्न भय सुनि।जहिना पूजा केलहुं ओहि क्रम में बेराबेरी विसर्जन करी


विसर्जन मंत्र-


नमो गणपत्यादि पंचदेवता: पूजिता: स्थ क्षमध्वं स्वस्थानं गच्छत।


विधवा- नमो विष्णो पूजितोऽसि प्रसीद क्षमस्व।


सधवा- नमो गौरि पूजितासि प्रसीद क्षमस्व।


नमो रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्र पूजितोऽसि प्रसीद क्षमस्व स्वस्थानं गच्छ।


दक्षिणा द्रव्य जल से सिक्त कय तील जल लय मंत्र-

नमोऽस्यां रात्रौ कृतेतद्रोहिणीसहित भाद्र शुक्ल चतुर्थी चंद्र पूजनतत्कथाश्रवणकर्मप्रतिष्ठार्थमेतावद्द्रव्य मूल्यकहिरण्यमग्निदैवतंयथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणामहं ददे।कुश तील जल द्रव्य पर अर्पण कय। दक्षिणा प्रतिपन्न करी ओ स्वाच्छन्न देता।


क्षमायाचना-- सपरिवार कलजोरी- हे चतुर्थी चंद्र हम त आहां के बच्चा छी यथासाध्य नैवेद्य फुल पान लय आहांक पुजा कयल कोनो त्रुटि लेल क्षमा करब।


तदुपरांत मड़ड उत्सर्ग कय भांगि आ प्रसाद वितरण करी।


पंडित भेट जाईथ त सर्वोत्तम नै त पिता/पती/पुत्र/भाई/कुटंब/संवंधी  से उपरोक्त विधि से पुजन करी।hatJha/

🌜"चौठचन्द्र" के कथा (चौरचन, चौठी चान)🌛

भादव मासक शुक्ल पक्षक चतुर्थी (चौठ) तिथिमे साँझखन चौठचन्द्रक पूजा होइत अछि ,जकरा लोक चौरचन पाबनि सेहो कहैछथि। पुराण में  प्रसिद्ध अछि, जे चन्द्रमा के अहि दिन कलंक लागल छलनि, ताहि कारण अहि समयमे चन्द्रमाक दर्शन के मनाही छैक। मान्यता अछि, जे एहि समयक चन्द्रमाक दर्शन करबापर कलंक लगैत अछि। मिथिला में अकर निवारण हेतु रोहिणी सहित चतुर्थी चन्द्रक पूजा कायल जाइतअछि । हिन्दू समाज मे श्री कृष्ण पूर्णावतार परम ब्रह्म परमेश्‍वर मानल गेल छथि ।  महर्षि पराशर हुनका चन्द्र सँ अवतीर्ण मानैत छथिन्ह । हुनके सँ सम्बन्धित स्कन्दपुराण मे चन्द्रोपाख्यान शीर्षक सँ कथावर्णित अछि जे निम्नलिखित अछि ।


नन्दिकेश्‍वर सनत्कुमार सँ कहैत छथिन्ह हे सनत कुमार ! यदि अहाँ अपन शुभक कामना करैत छी तऽ एकाग्रचित सँ चन्द्रोपाख्यान सुनू । पुरुष होथि वा नारी ओ भाद्र शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र पूजा करथि । ताहि सँ हुनका मिथ्या कलंक तथा सब प्रकारक विघ्नक नाश हेतैन्ह । 

सनत्कुमार पुछलिन्ह -  हे ऋषिवर ! ई व्रत कोना पृथ्वी पर आएल से कहु । 

नन्दकेश्‍वर बजलाह - ई व्रत सर्व प्रथम जगत केर नाथ श्री कृष्ण पृथ्वी पर कैलाह । सनत्कुमार के आश्‍चर्य भेलैन्ह षड्गुण ऐश्‍वर्य सं सम्पन्‍न सोलहो कला सँ पूर्ण, सृष्टिक कर्त्ता-धर्त्ता, ओ केना लोकनिन्दाक पात्र भेलाह ।

नन्दीकेश्‍वर कहैत छथिन्ह – हे सनत्कुमार! बलराम आओर कृष्ण वसुदेव केर पुत्र भऽ पृथ्वी पर वासकेलाह । ओ जरासन्धक भय सँ द्वारिका गेलाह ओतय विश्‍वकर्मा द्वारा अपन स्त्रीक लेल सोलह हजार तथा यादव सब केँ लेल छप्पन करोड़ घर केँ निर्माण कय वास केलाह । ओहि द्वारिका मे उग्रनाम केर यादव केँ दूटा बेटा छलैन्ह सतजित आओर प्रसेन । सतजित समुद्र तट पर जा अनन्य भक्‍तिसँ सूर्यक घोर तपस्या कय हुनका प्रसन्‍न केलाह । प्रसन्‍न सूर्य प्रगट भऽ वरदान माँगू कहलथिन्ह । सतजित हुनका सँ स्यमन्तक मणिक याचना कयलन्हि । सूर्य मणि दैत कहलथिन्ह - हे सतजित !एकरा पवित्रता पूर्वक धारण करब, अन्यथा अनिष्ट होएत । सतजित ओ मणि लऽ नगर मे प्रवेश करैतविचारय लगलाह ई मणि देखि कृष्ण मांगि नहि लेथि । ओ ई मणि अपन भाइ प्रसेन केँ देलथिन्ह । एकदिन प्रंसेन श्री कृष्ण केर संग शिकार खेलय लेल जंगल गेलाह । जंगल मे ओ पछुआ गेलाह । सिंह हुनका मारि मणि लऽ क चलल तऽ ओकरा जाम्बवान्‌ भालू मारि देलथिन्ह । जाम्बवान्‌ ओ लऽ अपनावील मे प्रवेश कऽ खेलऽ लेल अपना पुत्र केऽ देलथिन्ह ।

एम्हर कृष्ण अपना संगी साथीक संग द्वारिका ऐलाह । ओहि समूहक लोक सब प्रसेन केँ नहि देखि बाजय लगलाह जे ई पापी कृष्ण मणिक लोभ सँ प्रसेन केँ मारि देलाह । एहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण व्यथित भऽ चुप्पहि प्रसेनक खोज मे जंगल गेलाह । ओतऽ देखलाह प्रसेन मरल छथि । आगू गेलाह तऽ देखलाह एकटा सिंह मरल अछि । आगू गेलाह उत्तर एकटा वील देखलाह । ओहि वील मे प्रवेश केलाह । ओ वील अन्धकारमय छलैक । ओकर दूरी १०० योजन यानि ४०० मील छल । कृष्ण अपना तेज सँ अन्धकार के नाश कय जखन अंतिम स्थान पर पहुँचलाह तऽ देखैत छथि खूब मजबूत नीक खूब सुन्दर भवन अछि । ओहि मे खूब सुन्दर पालना पर एकटा बच्चा के दाय झुला रहल छैक । बच्चा क आँखिक सामने ओ मणि लटकल छैक आ दाय गबैत छैक –

सिंहः प्रसेनं अवधीत्, सिंहो जाम्बवता हतः ।

सुकुमारक मा रोदी तव हि एषः स्यमन्तकः ॥

अर्थात्‌ सिंह प्रसेन केँ मारलाह, सिंह जाम्बवान्‌ सँ मारल गेल, औ बौआ ! जूनि कानू! अहींक ई स्यमन्तक मणि अछि । तखनैहि एक अपूर्व सुन्दरी विधाताक अनुपम सृष्टि युवती ओतय अयलीह । ओ कृष्ण केँ देखि काम-ज्वर सँ व्याकुल भऽ गेलीह । ओ बजलीह – हे कमलनेत्र ! ई मणि अहाँ लियऽ आओर तुरत भागि जाउ । जा धरि हमर पिता जाम्बवान्‌ सुतल छथि । श्री कृष्ण प्रसन्‍न भऽ शंख बजा देलथिन्ह । जाम्बवान्‌ उठैते साथ  युद्ध करय लगलाह । हुनका दुनु केँ भयंकर बाहुयुद्ध २१ दिन धरि चलैत रहलन्हि । एम्हर द्वारिकावासी सात दिन धरि कृष्णक प्रतीक्षा कय हुनक प्रेतक्रिया सेहो कय देलथिन्ह । बाइसम दिन जाम्बवान्‌ ई निश्‍चित कय जे कि ई मानव नहि भऽ सकैत छथि । ई अवश्य परमेश्‍वर छथि । ओ युद्ध छोड़ि हुनकर प्रार्थना केलथिन्ह आर अपन कन्या जाम्बवती केँ अर्पण कय देलथिन्ह । भगवान् श्री कृष्ण मणि लैत जाम्बवतीक संग सभा भवन मे आइब जनताक समक्ष सतजीत केँ ओ स्यमन्तक मणि सादर समर्पित कयलाह । सतजीत प्रसन्‍न भऽ अपन पुत्री सत्यभामा कृष्ण केर सेवा लेल अर्पण कय देलथिन्ह ।

किछुए दिन मे दुरात्मा शतधन्बा नामक एकटा यादव सतजित केँ मारि ओ मणि लय लेलक । सत्यभामा सँ ई समाचार सूनि कृष्ण बलराम केँ कहलथिन्ह – हे भ्राताश्री! ई मणि हमरे योग्य अछि । एकरा शतधन्बा लऽ लेलक । ओकरा पकड़ू । शतधन्बा ई सूनि ओ मणि अक्रूर केँ दय देलथिन्ह आओर रथ पर चढ़ि दक्षिण दिशा मे भागि गेलाह । कृष्ण-बलराम १०० योजन धरि हुनकर पांछाँ केलाह । ओकरा संग मे मणि नहि देखि बलराम कृष्ण केँ फटकारऽ लगलाह, “हे कपटी कृष्ण ! अहाँ लोभी छी ।” कृष्ण केँ लाखों शपथ खेलोपरान्त ओ शान्त नहि भेलाह तथा विदर्भ देश चलि गेलाह । कृष्ण घूरि कय जहन द्वारिका एलाह तँ लोक सभ फेर कलंक देबऽ लगलैन्ह । ई कृष्ण मणिक लोभ सँ बलराम एहन शुद्ध भाय केँ फेर छलपूर्वक द्वारिका सँ बाहर कय देलाह । अहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण संतप्त रहय लगलाह । अहि बीच नारद (ओहि समयक पत्रकार) त्रिभुवनलोक मे घुमैत कृष्ण सँ मिलक लेल आयल छलाह । चिन्तातुर उदास कृष्ण केँ देखि पुछथिन्ह “हे देवेश ! किएक उदास छी ?” कृष्ण कहलथिन्ह, ” हे नारद ! हम बेरि-बेरि मिथ्यापवाद सँ पीड़ित भऽ रहल छी ।” नारद कहलथिन्ह, “हे देवेश ! अहाँ निश्‍चिते भादो मासक शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र देखने होएब तेँ अपने केँ बेरि-बेरि मिथ्या कलंक लगैछ । श्री कृष्ण नारद सँ पूछलथिन्ह, “चन्द्र दर्शन सँ किऐक ई दोष लगैत छैक ।”

नारद जी कहलथिन्ह, “जे अति प्राचीन काल मे चन्द्रमा गणेश जी सँ अभिशप्त भेलाह, अहाँक जेदेखताह हुनको मिथ्या कलंक लगतैन्ह ।” कृष्ण पूछलथिन्ह, “हे मुनिवर ! गणेश जी किऐक चन्द्रमा केँशाप देलथिन्ह ।” नारद जी कहलथिन्ह, “हे यदुनन्दन ! एक बेरि ब्रह्मा, विष्णु आओर महेश पत्नीकरुप मे अष्ट सिद्धि आओर नवनिधि केँ गणेश केँ अर्पण कय प्रार्थना केलखिन । गणेश प्रसन्न भऽहुनका तीनू केँ सृजन, पालन आओर संहार कार्य निर्विघ्न रूप सँ करु ई आशीर्वाद देलथिन्ह । ताहिकाल मे सत्यलोक सँ चन्द्रमा धीरे-धीरे नीचाँ आबि अपन सौन्दर्य मद सँ चूर भऽ गजवदन केँ उपहालकेलखिन । गणेश क्रुद्ध भऽ हुनका शाप देलथिन्ह, – “हे चन्द्र ! अहाँ अपन सुन्दरता सँ नितरा रहल छी। आइ सँ जे अहाँ केँ देखताह, हुनका मिथ्या कलंक लगतैन्ह ।” चन्द्रमा कठोर शाप सँ मलीन भऽ जलमे प्रवेश कय गेलाह । देवता लोकनि मे हाहाकार मचि गेल । ओ सब ब्रह्माक पास गेलाह । ब्रह्माकहलथिन्ह अहाँ सब गणेशे सँ जा कय विनती करू, वैह एकर उपाय बतेता । सब देवता पूछलखिन जे गणेशक दर्शन कोना होयत । ब्रह्मा बजलाह, “चतुर्थी तिथि केँ गणेश जी केर पूजा करु ।” सब देवताचन्द्रमा सँ कहलथिन्ह । चन्द्रमा चतुर्थीक गणेश पुजा केलाह । गणेश बालरुप मे प्रकट भऽ दर्शनदेलथिन्ह आओर कहलथिन्ह – चन्द्रमा हम प्रसन्‍न छी वरदान माँगू ।” चन्द्रमा प्रणाम करैतकहलथिन्ह, “हे सिद्धि विनायक हम शाप मुक्‍त होइ, पाप मुक्‍त होइ, सभ हमर दर्शन करय ।”गणेशजी कहलथिन जे हमर शाप व्यर्थ नहि जायत किन्तु शुक्ल पक्ष मे प्रथम उदित अहाँक दर्शन आओर नमन शुभकर रहत तथा भादोक शुक्ल पक्ष मे चतुर्थीक जे अहाँक दर्शन करताह हुनका लोकलांछणा लगतैन्ह । किन्तु यदि ओ “सिंहः प्रसेनं अवधीत्..” इत्यादि मन्त्र केँ पढ़ैत दर्शन करताह तथा हमर पूजा करताह हुनका ओ दोष नहि लगतैन्ह । एवम् प्रकारेन् श्रीकृष्ण सेहो नारद सँ प्रेरित भऽ एहिव्रत केर अनुष्ठान कयलाह । तहन ओ लोक कलंक सँ मुक्‍त भेलाह ।

सम्पादक:- आचार्य प्रभात झा (सिद्धान्त ज्योतिषाचार्य )
    मो॰    :-  +91-9155657892

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

शुभ मुहूर्त का महत्व

 श्री जनार्दन ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र

शुभ मुहूर्त का महत्व


ज्योतिष के अनुसार किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए उसे सही दिन और सही समय का चुनाव करने के बाद पूरा किया जाना चाहिए। वैदिक काल से ही किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को करने से पहले शुभ मुहूर्त देखने की परंपरा है। शुभ मुहूर्त को शुभ घड़ी या शुभ समय भी कहते हैं। शुभ मुहूर्त में किया गया कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होता है।
हालाँकि आज के इस मॉडर्न समय में कुछ लोग शुभ मुहूर्त को ज़्यादा महत्व नहीं देते और बिना ग्रह-नक्षत्रों की चाल का अध्ययन किये ही किसी भी कार्य का शुभारंभ कर देते हैं जिसकी वजह से कड़ी मेहनत, अच्छी प्लानिंग और सही नीयत होने के बावजूद भी वो कार्य सफल नहीं हो पाता है। इसका मुख्य कारण ग्रहों का उस समय अनुकूल न होना है इसीलिए पुराने समय से लेकर आज तक किसी भी महत्वपूर्ण काम को करने के शुभ मुहूर्त निकलवाया जाता है।
आईये जानते है कि कैसे कोई भी एक समय शुभ मुहूर्त बनता है-

शुभ मुहूर्त कैसे बनता है?


ज्योतिष के अनुसार किसी भी कार्य के लिए शुभ मुहूर्त निकालने के लिए कुछ खास बातों को ध्यान में रखा जाता है, जैसे- “तिथि, वार, योग, नक्षत्र, करण, नव ग्रहों की स्थिति, मलमास, अधिक मास, शुक्र और गुरु अस्त, शुभ योग, अशुभ योग, भद्रा, शुभ लग्न, और राहु काल, आदि” इन्हीं के कुल योग से मिलाकर शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। शुभ योगों की गणना कर उनका सही समय पर जीवन में इस्तेमाल करना ही शुभ मुहूर्त पर किया गया काम कहलाता है। वहीं दूसरी तरफ, अशुभ योगों के दौरान बनने वाले मुहूर्त में किया गया कार्य कभी भी पूरी तरह से सफल नहीं होता।
हिन्दू धर्म में मुहूर्त एक समय मापन इकाई माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार देखें तो दिन और रात का समय मिलाकर एक दिन में 24 घंटा होता है और इन 24 घंटों में कुल 30 मुहूर्त निकलते हैं, जिनमे से हर एक मुहूर्त लगभग 48 मिनट का होता है। साधारण शब्दों में कहें तो एक मुहूर्त बराबर होता है दो घड़ी के या करीब-करीब 48 मिनट के।

मुहूर्त के प्रकार और उसके गुण


शुभ मुहूर्त  को जानने से पहले ये समझ लें कि जैसा हमने आपको ऊपर बताया कि हिन्दू पंचांग के अनुसार 24 घंटे यानि दिन और रात मिलाकर कुल 30 मुहूर्त होते हैं। पहला मुहूर्त “रुद्र”, जो कि एक अशुभ मुहूर्त माना गया है वो प्रात: 6 बजे शुरू होता है। उसके बाद दूसरा मुहूर्त आहि है, जो रूद्र मुहूर्त के ठीक 48 मिनट बाद शुरू होता है। यह भी एक अशुभ मुहूर्त ही है। इसके बाद के सभी मुहूर्त और उसके गुण जिनकी जानकारी नीचे तालिका में दी जा रही है, इन सभी का समय भी 48-48 मिनट का ही होता है।

♧मुहूर्त के नाम- गुण

रूद्र-अशुभ, अहि-अशुभ, मित्र-शुभ, पितृ-अशुभ, वसु-शुभ, वाराह-शुभ, विश्वेदेवा-शुभ, विधि-शुभ (सोमवार और शुक्रवार छोड़कर),सतमुखी-शुभ, पुरुहूत-अशुभ, वाहिनी-अशुभ, नक्तनकरा-अशुभ, वरुण-शुभ, अर्यमा-शुभ (रविवार छोड़कर), भग-अशुभ, गिरीश-अशुभ, अजपाद-अशुभ, अहिर-बुध्न्य-शुभ, पुष्य-शुभ, अश्विनी-शुभ, यम-अशुभ, अग्नि-शुभ, विधातृ-शुभ, कण्ड-शुभ, अदिति-शुभ, जीव/अमृतअति- शुभ, विष्णु-शुभ, द्युमद्गद्युति-शुभ, ब्रह्मअति- शुभ, समुद्रम-शुभ ।


♧ तिथि

वैदिक पंचांग की एक तिथि एक सूर्योदय से शुरु होकर दूसरे सूर्योदय तक व्याप्त रहती है। कभी-कभी एक ही दिन में दो तिथियाँ भी आ जाती हैं। इनमें से जब तिथि सूर्योदय नहीं देख पाती उसे क्षय तिथि कहते हैं, जबकि जो तिथि दो सूर्योदय तक व्याप्त रहती है, उसे वृद्धि तिथि कहती हैं। पंचांग के अनुसार एक माह में कुल 30 तिथियाँ होती हैं, जिनमें से कृष्ण और शुक्ल पक्ष की 15-15 तिथियाँ होती हैं। वर्ष के सभी शुभ मुहूर्त की गणना इन सभी तिथियों की स्पष्ट जानकारी के अनुसार ही की गई है।
♤ चलिए जानते हैं शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की सभी तिथियों के नाम।

♧कृष्ण पक्ष की तिथियाँ

प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या
♧शुक्ल पक्ष की तिथियाँ

प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा

♧वार/ दिन

पंचांग के अनुसार एक सप्ताह में कुल सात वार यानि सात दिन होते हैं। सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार। इनमें से हर एक वार की अपनी एक विशेष और अलग प्रकृति होती है और किसी भी शुभ मुहूर्त की गणना के समय वार/दिन का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। सप्ताह के कुछ दिन ऐसे होते हैं, जिस दौरान कोई विशेष धार्मिक कार्य करना वर्जित होता है, जैसे कि मंगलवार का दिन। वहीं दूसरी ओर इन सात वारों में रविवार और गुरुवार का दिन कई मायनों में श्रेष्ठ माना गया है। इन दोनों में भी गुरुवार का दिन सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि गुरु की दिशा ईशान है और ईशान कोण में ही सभी देवताओं का वास होता है।

  शुभ मुहूर्त की गणना में नक्षत्र का भी खास ध्यान रखा गया है।♤नक्षत्र कुल संख्या में 27 होते हैं। चलिए जानते है सभी नक्षत्रों और उनके स्वामी के नाम-

अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती।

नक्षत्रों के स्वामी ग्रह

केतु -अश्विनी, मघा, मूल।

शुक्र -भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा।

सूर्य -कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा।

चन्द्र - रोहिणी, हस्त, श्रवण।

मंगल -मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा।

राहु -आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा।

बृहस्पति -पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपद।

शनि -पुष्य, अनुराधा, उत्तरा भाद्रपद।
बुध -आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती।

♧करण

एक तिथि में दो करण होते हैं, या यूँ कह लें कि तिथि का आधा भाग करण कहलाता है। एक करण तिथि के पूर्वार्ध में होता है और एक तिथि के उत्तरार्ध में। ऐसे में पंचांग के अनुसार, कुल 11 करण होते हैं, जिनमें से जहाँ चार करण की प्रकृति स्थिर होती है, तो वहीं शेष करण चर प्रकृति के होते हैं। किसी भी शुभ मुहूर्त की गणना के दौरान करणों की स्थिति का आकलन करना भी बेहद ज़रूरी होता है।
♤चलिए जानते हैं सभी 11 करणों के बारे में:
♧करण के नामप्रकृति
किस्तुघ्न-स्थिर, बव-चर, बालव-चर, कौलव-चर, गर-चर, तैतिल-चर, वणिज-चर, विष्टि/भद्रा-चर, शकुनि-स्थिर, नाग-स्थिर, चतुष्पाद-स्थिर ।
◇किसी भी नए एवं मांगलिक कार्य का आरम्भ के लिए ऊपर बताये सभी करणों में से विष्टि करण अथवा भद्रा करण को सबसे ज़्यादा अशुभ माना जाता है। ऐसे में इस दौरान किसी भी काम को इस करण में करना वर्जित होता है।

♧योग

पञ्चांग में कुल 27 योग के विषय में चर्चा की गयी है, जो कि सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर बताए गए हैं। इन योगों का मुहूर्त के दौरान अपना-अपना अलग महत्व होता है। सभी 27 योगों में से 9 योगों को बेहद अशुभ, तो वहीं इन 9 के अलावा बाकि सभी योगों को शुभ भी माना जाता है। अशुभ योगों में कोई भी शुभ काम करना वर्जित होता है।
♤चलिए डालते हैं एक नज़र सभी 27 योगों और उनके स्वभाव पर:-

♧योग के नामगुण

विष्कुम्भ-अशुभ, प्रीति-शुभ, आयुष्मान-शुभ, सौभाग्य-शुभ, शोभन-शुभ, अतिगण्ड-अशुभ, सुकर्मा-शुभ, धृति-शुभ, शूल-अशुभ, गण्ड-अशुभ, वृद्धि-शुभ, ध्रुव-शुभ, व्याघात-अशुभ, हर्षण-शुभ, वज्र-अशुभ, सिद्धि-शुभ, व्यतिपात-अशुभ, वरीयान-शुभ, परिघ-अशुभ, शिव-शुभ, सिद्ध-शुभ, साध्य-शुभ, शुभ-शुभ, शुक्ल-शुभ, ब्रह्म-शुभ, ऐन्द्र-शुभ, वैधृति-अशुभ ।

              ।।धन्यवाद ।।

सम्पादक:- आचार्य प्रभात झा 

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रविवार, 4 अप्रैल 2021

ज्ञान की बातें ।

 #हिंदुओं #जानो #अपने #धर्म और #संस्कृति के #बारे #मे


*पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -*

*1. युधिष्ठिर    2. भीम    3. अर्जुन*

*4. नकुल।      5. सहदेव*


*( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )*


*यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन*

*की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।*


*वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..*

*कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -*

*1. दुर्योधन      2. दुःशासन   3. दुःसह*

*4. दुःशल        5. जलसंघ    6. सम*

*7. सह            8. विंद         9. अनुविंद*

*10. दुर्धर्ष       11. सुबाहु।   12. दुषप्रधर्षण*

*13. दुर्मर्षण।   14. दुर्मुख     15. दुष्कर्ण*

*16. विकर्ण     17. शल       18. सत्वान*

*19. सुलोचन   20. चित्र       21. उपचित्र*

*22. चित्राक्ष     23. चारुचित्र 24. शरासन*

*25. दुर्मद।       26. दुर्विगाह  27. विवित्सु*

*28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ*

*31. नन्द।        32. उपनन्द   33. चित्रबाण*

*34. चित्रवर्मा    35. सुवर्मा    36. दुर्विमोचन*

*37. अयोबाहु   38. महाबाहु  39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग  42. भीमबल*

*43. बालाकि    44. बलवर्धन 45. उग्रायुध*

*46. सुषेण       47. कुण्डधर  48. महोदर*

*49. चित्रायुध   50. निषंगी     51. पाशी*

*52. वृन्दारक   53. दृढ़वर्मा   54. दृढ़क्षत्र*

*55. सोमकीर्ति  56. अनूदर    57. दढ़संघ 58. जरासंघ   59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक*

*61. उग्रश्रवा   62. उग्रसेन     63. सेनानी*

*64. दुष्पराजय        65. अपराजित* 

*66. कुण्डशायी        67. विशालाक्ष*

*68. दुराधर   69. दृढ़हस्त    70. सुहस्त*

*71. वातवेग  72. सुवर्च    73. आदित्यकेतु*

*74. बह्वाशी   75. नागदत्त 76. उग्रशायी*

*77. कवचि    78. क्रथन। 79. कुण्डी* 

*80. भीमविक्र 81. धनुर्धर  82. वीरबाहु*

*83. अलोलुप  84. अभय  85. दृढ़कर्मा*

*86. दृढ़रथाश्रय    87. अनाधृष्य*

*88. कुण्डभेदी।     89. विरवि*

*90. चित्रकुण्डल    91. प्रधम*

*92. अमाप्रमाथि    93. दीर्घरोमा*

*94. सुवीर्यवान     95. दीर्घबाहु*

*96. सुजात।         97. कनकध्वज*

*98. कुण्डाशी        99. विरज*

*100. युयुत्सु*


*( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,*

*जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )*


*"श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में-*


*ॐ . किसको किसने सुनाई?*

*उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।* 


*ॐ . कब सुनाई?*

*उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।*


*ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?*

*उ.- रविवार के दिन।*


*ॐ. कोनसी तिथि को?*

*उ.- एकादशी* 


*ॐ. कहा सुनाई?*

*उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।*


*ॐ. कितनी देर में सुनाई?*

*उ.- लगभग 45 मिनट में*


*ॐ. क्यू सुनाई?*

*उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।*


*ॐ. कितने अध्याय है?*

*उ.- कुल 18 अध्याय*


*ॐ. कितने श्लोक है?*

*उ.- 700 श्लोक*


*ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?*

*उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।* 


*ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा* 

*और किन किन लोगो ने सुना?*

*उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने*


*ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?*

*उ.- भगवान सूर्यदेव को*


*ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?*

*उ.- उपनिषदों में*


*ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?*

*उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।*


*ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?*

*उ.- गीतोपनिषद*


*ॐ. गीता का सार क्या है?*

*उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना*


*ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?*

*उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574*

*अर्जुन ने- 85* 

*धृतराष्ट्र ने- 1*

*संजय ने- 40.*


*अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद*


*अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।*


*33 करोड नहीँ  33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू*

*धर्म मेँ।*


*कोटि = प्रकार।* 

*देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,*


*कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।*


*हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं...*


*कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-*


*12 प्रकार हैँ*

*आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,*

*शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,*

*सविता, तवास्था, और विष्णु...!*


*8 प्रकार हे :-*

*वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।*


*11 प्रकार है :-* 

*रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,*

*अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,*

*रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।*


*एवँ*

*दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।*


*कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी* 


*अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है*

*तो इस जानकारी को अधिक से अधिक*

*लोगो तक पहुचाएं। ।*


*🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏*


*१ हिन्दु हाेने के नाते जानना ज़रूरी है*


*THIS IS VERY GOOD INFORMATION FOR ALL OF US ... जय श्रीकृष्ण ...*


*अब आपकी बारी है कि इस जानकारी*

 *को आगे बढ़ाएँ ......*


*अपनी भारत की संस्कृति* 

*को पहचाने.*

*ज्यादा से ज्यादा*

*लोगो तक पहुचाये.* 

*खासकर अपने बच्चो को बताए* 

*क्योकि ये बात उन्हें कोई नहीं* *बताएगा...*


*📜😇  दो पक्ष-*


*कृष्ण पक्ष ,* 

*शुक्ल पक्ष !*


*📜😇  तीन ऋण -*


*देव ऋण ,* 

*पितृ ऋण ,* 

*ऋषि ऋण !*


*📜😇   चार युग -*


*सतयुग ,* 

*त्रेतायुग ,*

*द्वापरयुग ,* 

*कलियुग !*


*📜😇  चार धाम -*


*द्वारिका ,* 

*बद्रीनाथ ,*

*जगन्नाथ पुरी ,* 

*रामेश्वरम धाम !*


*📜😇   चारपीठ -*


*शारदा पीठ ( द्वारिका )*

*ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )* 

*गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,* 

*शृंगेरीपीठ !*


*📜😇 चार वेद-*


*ऋग्वेद ,* 

*अथर्वेद ,* 

*यजुर्वेद ,* 

*सामवेद !*


*📜😇  चार आश्रम -*


*ब्रह्मचर्य ,* 

*गृहस्थ ,* 

*वानप्रस्थ ,* 

*संन्यास !*


*📜😇 चार अंतःकरण -*


*मन ,* 

*बुद्धि ,* 

*चित्त ,* 

*अहंकार !*


*📜😇  पञ्च गव्य -*


*गाय का घी ,* 

*दूध ,* 

*दही ,*

*गोमूत्र ,* 

*गोबर !*


*📜😇  पञ्च देव -*


*गणेश ,* 

*विष्णु ,* 

*शिव ,* 

*देवी ,*

*सूर्य !*


*📜😇 पंच तत्त्व -*


*पृथ्वी ,*

*जल ,* 

*अग्नि ,* 

*वायु ,* 

*आकाश !*


*📜😇  छह दर्शन -*


*वैशेषिक ,* 

*न्याय ,* 

*सांख्य ,*

*योग ,* 

*पूर्व मिसांसा ,* 

*दक्षिण मिसांसा !*


*📜😇  सप्त ऋषि -*


*विश्वामित्र ,*

*जमदाग्नि ,*

*भरद्वाज ,* 

*गौतम ,* 

*अत्री ,* 

*वशिष्ठ और कश्यप!* 


*📜😇  सप्त पुरी -*


*अयोध्या पुरी ,*

*मथुरा पुरी ,* 

*माया पुरी ( हरिद्वार ) ,* 

*काशी ,*

*कांची* 

*( शिन कांची - विष्णु कांची ) ,* 

*अवंतिका और* 

*द्वारिका पुरी !*


*📜😊  आठ योग -* 


*यम ,* 

*नियम ,* 

*आसन ,*

*प्राणायाम ,* 

*प्रत्याहार ,* 

*धारणा ,* 

*ध्यान एवं* 

*समाधि !*


*📜😇 आठ लक्ष्मी -*


*आग्घ ,* 

*विद्या ,* 

*सौभाग्य ,*

*अमृत ,* 

*काम ,* 

*सत्य ,* 

*भोग ,एवं* 

*योग लक्ष्मी !*


*📜😇 नव दुर्गा --*


*शैल पुत्री ,* 

*ब्रह्मचारिणी ,*

*चंद्रघंटा ,* 

*कुष्मांडा ,* 

*स्कंदमाता ,* 

*कात्यायिनी ,*

*कालरात्रि ,* 

*महागौरी एवं* 

*सिद्धिदात्री !*


*📜😇   दस दिशाएं -*


*पूर्व ,* 

*पश्चिम ,* 

*उत्तर ,* 

*दक्षिण ,*

*ईशान ,* 

*नैऋत्य ,* 

*वायव्य ,* 

*अग्नि* 

*आकाश एवं* 

*पाताल !*


*📜😇  मुख्य ११ अवतार -*


 *मत्स्य ,* 

*कच्छप ,* 

*वराह ,*

*नरसिंह ,* 

*वामन ,* 

*परशुराम ,*

*श्री राम ,* 

*कृष्ण ,* 

*बलराम ,* 

*बुद्ध ,* 

*एवं कल्कि !*


*📜😇 बारह मास -* 


*चैत्र ,* 

*वैशाख ,* 

*ज्येष्ठ ,*

*अषाढ ,* 

*श्रावण ,* 

*भाद्रपद ,* 

*अश्विन ,* 

*कार्तिक ,*

*मार्गशीर्ष ,* 

*पौष ,* 

*माघ ,* 

*फागुन !*


*📜😇  बारह राशी -* 


*मेष ,* 

*वृषभ ,* 

*मिथुन ,*

*कर्क ,* 

*सिंह ,* 

*कन्या ,* 

*तुला ,* 

*वृश्चिक ,* 

*धनु ,* 

*मकर ,* 

*कुंभ ,*

*मीन!*


*📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग -* 


*सोमनाथ ,*

*मल्लिकार्जुन ,*

*महाकाल ,* 

*ओमकारेश्वर ,* 

*बैजनाथ ,* 

*रामेश्वरम ,*

*विश्वनाथ ,* 

*त्र्यंबकेश्वर ,* 

*केदारनाथ ,* 

*घुष्नेश्वर ,*

*भीमाशंकर ,*

*नागेश्वर !*


*📜😇 पंद्रह तिथियाँ -*


*प्रतिपदा ,*

*द्वितीय ,*

*तृतीय ,*

*चतुर्थी ,* 

*पंचमी ,* 

*षष्ठी ,* 

*सप्तमी ,* 

*अष्टमी ,* 

*नवमी ,*

*दशमी ,* 

*एकादशी ,* 

*द्वादशी ,* 

*त्रयोदशी ,* 

*चतुर्दशी ,* 

*पूर्णिमा ,* 

*अमावास्या !*


*📜😇 स्मृतियां -* 


*मनु ,* 

*विष्णु ,* 

*अत्री ,* 

*हारीत ,*

*याज्ञवल्क्य ,*

*उशना ,* 

*अंगीरा ,* 

*यम ,* 

*आपस्तम्ब ,* 

*सर्वत ,*

*कात्यायन ,* 

*ब्रहस्पति ,* 

*पराशर ,* 

*व्यास ,* 

*शांख्य ,*

*लिखित ,* 

*दक्ष ,* 

*शातातप ,* 

*वशिष्ठ !*


हिन्दू धर्म की 10 महत्वपूर्ण बातें ........


१...10 ध्वनियां :  1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग


२,,,,10 कर्तव्य:- 1. संध्यावंदन, 2. व्रत, 3. तीर्थ, 4. उत्सव, 5. दान, 6. सेवा 7. संस्कार, 8. यज्ञ, 9. वेदपाठ, 10. धर्म प्रचार। आओ जानते हैं इन सभी को विस्तार से।


३,,,,10 दिशाएं : दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं।


४....10 दिग्पाल : 10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत।


५.….10 देवीय आत्मा : 1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवा अश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.येति, 10.मकर।


६.....10 देवीय वस्तुएं : 1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कर्ण के कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि और संजीवनी बूटी।


७....10 पवित्र पेय : 1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस


८....10 महाविद्या : 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्‍वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।


९....10 उत्सव : नवसंवत्सर, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, पोंगल, होली, दीपावली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्‍टमी, महाशिवरात्री और नवरात्रि।


१०...10 बाल पुस्तकें : 1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह।


११....10 पूजा : गंगा दशहरा, आंवला नवमी पूजा, वट सावित्री, तुलसी विवाह पूजा, शीतलाष्टमी, गोवर्धन पूजा, हरतालिका तिज, दुर्गा पूजा, भैरव पूजा और छठ पूजा।


१२...10 धार्मिक स्थल : 12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ, 4 धाम, 7 पुरी, 7 नगरी, 4 मठ, आश्रम, 10 समाधि स्थल, 5 सरोवर, 10 पर्वत और 10 गुफाएं।


१३..10 पूजा के फूल : आंकड़ा, गेंदा, पारिजात, चंपा, कमल, गुलाब, चमेली, गुड़हल, कनेर, और रजनीगंधा।


१४...10 धार्मिक सुगंध : गुग्गुल, चंदन, गुलाब, केसर, कर्पूर, अष्टगंथ, गुढ़-घी, समिधा, मेहंदी, चमेली।


१५...10 यम-नियम :1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। 6.शौच 7.संतोष, 8.तप, 9.स्वाध्याय और 10.ईश्वर-प्रणिधान।


१६...10 सिद्धांत : 

1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्‍वर है दूसरा नहीं), 2.आत्मा अमर है, 

3.पुनर्जन्म होता है, 

4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है, 5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से ‍कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है, 6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है, 

7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है, 

8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है, 9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है, 

10.दान ही पुण्य है।


*॥ हरे कृष्णा हरे कृष्ण* 

*कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥*

*॥ हरे राम हरे राम*

*॥ राम राम हरे हरे ॥*


*इस पोस्ट को अधिकाधिक शेयर करें जिससे सबको हमारी संस्कृति का ज्ञान हो।*


*🙏🏻॥ जय श्री कृष्णा ॥🙏🏻*

🚩🚩 *जय हनुमान* 🚩🚩

  🚩🚩  **🙏🏻🙏🏻🙏🏻

मंगलवार, 16 मार्च 2021

आयुर्वेदिक चिकित्सा उपचार

आयुर्वेदिक चिकित्सा उपचार 

*👉🏻दूध ना पचे तो ~ सोंफ* ,

*👉🏻दही ना पचे तो ~ सोंठ*,

*👉🏻छाछ ना पचे तो ~जीरा व काली मिर्च*

*👉🏻अरबी व मूली ना पचे तो ~ अजवायन*

*👉🏻कड़ी ना पचे तो ~ कड़ी पत्ता,*

*👉🏻तैल, घी, ना पचे तो ~  कलौंजी...* 

*👉🏻पनीर ना पचे तो ~ भुना जीरा,*

*👉🏻भोजन ना पचे तो ~ गर्म जल*

*👉🏻केला ना पचे तो  ~ इलायची*             

*👉🏻ख़रबूज़ा ना पचे तो ~ मिश्री का उपयोग करें...*

1.योग,भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं है।

2. *लकवा* - सोडियम की कमी के कारण होता है ।

3. *हाई वी पी में* -  स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी मे डालकर स्नान करे ।

4. *लो बी पी* - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें ।

5. *कूबड़ निकलना*- फास्फोरस की कमी ।

6. *कफ* - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है , फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है । गुड व शहद खाएं 

7. *दमा, अस्थमा* - सल्फर की कमी ।

8. *सिजेरियन आपरेशन* - आयरन , कैल्शियम की कमी ।

9. *सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें* ।

10. *अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें* ।

11. *जम्भाई*- शरीर में आक्सीजन की कमी ।

12. *जुकाम* - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पियें ।

13. *ताम्बे का पानी* - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव पानी ना पियें ।

14.  *किडनी* - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पिये ।

15. *गिलास* एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्स अधिक होता है । गिलास अंग्रेजो ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है अतः लोटे का पानी पियें,  लोटे का कम  सर्फेसटेन्स होता है ।

16. *अस्थमा , मधुमेह , कैंसर* से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं ।

17. *वास्तु* के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा ।

18. *परम्परायें* वहीँ विकसित होगीं जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं ।

19. *पथरी* - अर्जुन की छाल से पथरी की समस्यायें ना के बराबर है । 

20. *RO* का पानी कभी ना पियें यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता । कुएँ का पानी पियें । बारिस का पानी सबसे अच्छा , पानी की सफाई के लिए *सहिजन* की फली सबसे बेहतर है ।

21. *सोकर उठते समय* हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का *स्वर* चल रहा हो उधर करवट लेकर उठें ।

22. *पेट के बल सोने से* हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है । 

23.  *भोजन* के लिए पूर्व दिशा , *पढाई* के लिए उत्तर दिशा बेहतर है ।

24.  *HDL* बढ़ने से मोटापा कम होगा LDL व VLDL कम होगा ।

25. *गैस की समस्या* होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें ।

26.  *चीनी* के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है , यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है। चीनी खाने से *पित्त* बढ़ता है । 

27.  *शुक्रोज* हजम नहीं होता है *फ्रेक्टोज* हजम होता है और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है ।

28. *वात* के असर में नींद कम आती है ।

29.  *कफ* के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है ।

30. *कफ* के असर में पढाई कम होती है ।

31. *पित्त* के असर में पढाई अधिक होती है ।

33.  *आँखों के रोग* - कैट्रेक्टस, मोतियाविन्द, ग्लूकोमा , आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है ।

34. *शाम को वात*-नाशक चीजें खानी चाहिए ।

35.  *प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए* ।

36. *सोते समय* रक्त दवाव सामान्य या सामान्य से कम होता है ।

37. *व्यायाम* - *वात रोगियों* के लिए मालिश के बाद व्यायाम , *पित्त वालों* को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए । *कफ के लोगों* को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए ।

38. *भारत की जलवायु* वात प्रकृति की है , दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए ।

39. *जो माताएं* घरेलू कार्य करती हैं उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं ।

40. *निद्रा* से *पित्त* शांत होता है , मालिश से *वायु* शांति होती है , उल्टी से *कफ* शांत होता है तथा *उपवास* ( लंघन ) से बुखार शांत होता है ।

41.  *भारी वस्तुयें* शरीर का रक्तदाब बढाती है , क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है ।

42. *दुनियां के महान* वैज्ञानिक का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा, चाहे वह 8 वीं फेल न्यूटन हों या 9 वीं फेल आइस्टीन हों , 

43. *माँस खाने वालों* के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं ।

44. *तेल हमेशा* गाढ़ा खाना चाहिएं सिर्फ लकडी वाली घाणी का , दूध हमेशा पतला पीना चाहिए ।

45. *छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है ।* 

46. *कोलेस्ट्रोल की बढ़ी* हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है । ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है ।

47. *मिर्गी दौरे* में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए । 

48. *सिरदर्द* में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें ।

49. *भोजन के पहले* मीठा खाने से बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है । 

50. *भोजन* के आधे घंटे पहले सलाद खाएं उसके बाद भोजन करें । 

51. *अवसाद* में आयरन , कैल्शियम , फास्फोरस की कमी हो जाती है । फास्फोरस गुड और अमरुद में अधिक है 

52.  *पीले केले* में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है । हरे केले में कैल्शियम थोडा कम लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम आयरन ज्यादा होता है । हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है जिसमे कैल्शियम अधिक होता है ।

53.  *छोटे केले* में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है ।

54. *रसौली* की गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं ।

55.  हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर है ।

56. *एंटी टिटनेस* के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दे ।

57. *ऐसी चोट* जिसमे खून जम गया हो उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें । बच्चो को एक बूंद पानी में डालकर दें । 

58. *मोटे लोगों में कैल्शियम* की कमी होती है अतः त्रिफला दें । त्रिकूट ( सोंठ+कालीमिर्च+ मघा पीपली ) भी दे सकते हैं ।

59. *अस्थमा में नारियल दें ।* नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है ।दालचीनी + गुड + नारियल दें ।

60. *चूना* बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढाता है । 

61.  *दूध* का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है ।

62.  *गाय की घी सबसे अधिक पित्तनाशक फिर कफ व वायुनाशक है ।* 

63.  *जिस भोजन* में सूर्य का प्रकाश व हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए 

64.  *गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें ।*

65.  *गाय के दूध* में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है ।

66.  *मासिक के दौरान* वायु बढ़ जाता है , 3-4 दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए इससे  गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है । दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें ।

67. *रात* में आलू खाने से वजन बढ़ता है ।

68. *भोजन के* बाद बज्रासन में बैठने से *वात* नियंत्रित होता है ।

69. *भोजन* के बाद कंघी करें कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए । बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा ।

70. *अजवाईन* अपान वायु को बढ़ा देता है जिससे पेट की समस्यायें कम होती है 

71. *अगर पेट* में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें 

72. *कब्ज* होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एडियों के बल चलना चाहिए । 

73. *रास्ता चलने*, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए । 

74. *जो दिन मे दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है ।* 

75.  *बिना कैल्शियम* की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते है ।

76. *स्वस्थ्य व्यक्ति* सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है ।

77. *भोजन* करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है ।

78. *सुबह के नाश्ते* में फल , *दोपहर को दही* व *रात्रि को दूध* का सेवन करना चाहिए । 

79. *रात्रि* को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए । जैसे - दाल , पनीर , राजमा , लोबिया आदि । 

80.  *शौच और भोजन* के समय मुंह बंद रखें , भोजन के समय टी वी ना देखें । 

81. *मासिक चक्र* के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान , व आग से दूर रहना चाहिए । 

82. *जो बीमारी जितनी देर से आती है , वह उतनी देर से जाती भी है ।*

83. *जो बीमारी अंदर से आती है , उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए ।*

84. *एलोपैथी* ने एक ही चीज दी है , दर्द से राहत । आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी , लीवर , आतें , हृदय ख़राब हो रहे हैं । एलोपैथी एक बिमारी खत्म करती है तो दस बिमारी देकर भी जाती है । 

85. *खाने* की वस्तु में कभी भी ऊपर से नमक नहीं डालना चाहिए , ब्लड-प्रेशर बढ़ता है । 

86 .  *रंगों द्वारा* चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें , पहले जामुनी , फिर नीला ..... अंत में लाल रंग । 

87 . *छोटे* बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए , क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है , स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए 

88. *जो सूर्य निकलने* के बाद उठते हैं , उन्हें पेट की भयंकर बीमारियां होती है , क्योंकि बड़ी आँत मल को चूसने लगती है । 

89.  *बिना शरीर की गंदगी* निकाले स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है , मल-मूत्र से 5% , कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं । 

90. *चिंता , क्रोध , ईर्ष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है जिससे कब्ज , बबासीर , अजीर्ण , अपच , रक्तचाप , थायरायड की समस्या उतपन्न होती है ।* 

91.  *गर्मियों में बेल , गुलकंद , तरबूजा , खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली , सोंठ का प्रयोग करें ।*

92. *प्रसव* के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है । बच्चो को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती  है ।

93. *रात को सोते समय* सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें त्वचा में निखार आएगा 

94. *दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं , हमें उपयोग करना आना चाहिए*।

95. *जो अपने दुखों* को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है , वही मोक्ष का अधिकारी है । 

96. *सोने से* आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है , लकवा , हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है । 

97. *स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है*। 

98 . *तेज धूप* में चलने के बाद , शारीरिक श्रम करने के बाद , शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है 

99. *त्रिफला अमृत है* जिससे *वात, पित्त , कफ* तीनो शांत होते हैं । इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना ।  


100. इस विश्व की सबसे मँहगी *दवा लार* है , जो प्रकृति की हमें  अनमोल भेंट है ,इसे थूक कर बरबाद ना करें।

सम्पादक:- आचार्य प्रभात झा 

मो•:- 9155657892

चौठचन्द्र {चौरचन} पूजा विधि मन्त्र और कथा सहित

चौठचन्द्र (चौरचन) पूजा विधि मन्त्र और कथा सहित   जय चौठचन्द्र भगवान🙏🏼🙏🏼 ============= भादव शुक्ल चतुर्थी पहिल साँझ व्रती स्नान कऽ ...